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स्वर्ण मानक से स्वर्ण विनिमय मानक तक

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‘‘सरकार ड्राफट अपने फारेन गोल्ड क्रेडिट (अर्थात् स्वर्ण के आरक्षित भंडार) की साख पर बेचती है जबकि देश में मुद्रा अपेक्षाकृत फालतू पड़ी होती है। इसका इस बात से पता चलता है कि विनिमय स्वर्ण निर्यात बिन्दु तक पहुंच जाता है। इस तरह प्रचलन से मुद्रा निकाल कर तथा ड्राफटों की अदायगी के फलस्वरूप मिली स्थानीय मुद्राओं को बंद कर के रख देने से व्यर्थ पड़ी मुद्रा का भार कम हो जाता है। फारेन बिल्स को रोक कर रखने की प्रणाली में मुद्रा बाजार को संरक्षण देने के लिए केन्द्रीय बैंक अपने फारेन बिल्स बेच देता है, विशेष कर उस समय जब अपने देश में मुद्रा का अपेक्षाकृत अभाव होता है। इस तरह आयात के लिए अथवा उसका निर्यात रोकने के लिए स्वर्ण मिल जाता है। पहले मामले में ड्राफटों की बिक्री स्वर्ण के निर्यात की जगह की जाती है और स्थानीय मुद्रा का प्रचलन से निकलना, यथार्थ में निर्यात के समान है। दूसरे मामले में विदेशों में ड्राफट की बिक्री आयात के लिए स्वर्ण प्राप्त करने या उसका निर्यात रोकने के लिए होती है।’’

इस तरह हम मि. केन्स के इस विश्वास से सहमत नहीं हो सकते कि भारतीय मुद्रा प्रणाली और यूरोपियन मुद्रा प्रणालियों में कोई समानता है । परन्तु यदि हम भारतीय मुद्रा प्रणाली के समान्तर कोई मुद्रा प्रणाली देखना चाहते हैं तो वह थी इंग्लैंड में बैंक सस्पेंशन के समय (1797-1821) में प्रचलित मुद्रा प्रणाली। यदि हम एक क्षण के लिए भारत सरकार के प्रेषण कार्यों और भारत सचिव को एक तरफ कर दें जिनसे भारतीय मुद्रा की स्थिति धुंधली हो जाती है, तो दोनों प्रणालियों में मूलभूत समानता असंदिग्धता नजर आती है। यदि हम इस परदे को हटा दें और निकट से जांच करें तो भारतीय मुद्रा प्रणाली की निम्नलिखित विशेषताएं नजर आती हैःµ

(1) स्वर्ण का पौंड पूर्ण वैध सिक्का है_

(2) चांदी का रुपया भी पूर्ण वैध सिक्का है_

(3) सरकार पौंड के बदले रुपये देने का वायदा करती है परंतु रुपयों के बदले

पौंड देने का नहीं_ अर्थात् रुपया अपरिवर्तनीय मुद्रा है और असीमित मात्रा

में जारी किया जा सकता है।

बैंक सस्पेंशन की अवधि में इंगलिश मुद्रा प्रणाली की निम्नलिखित विशेषताएं थीः-

(1) स्वर्ण का पौंड पूर्ण वैध मुद्रा थी।

(2) कानून के मुताबिक भले ही न हो, व्यवहार में बैंक ऑफ इंग्लैंड के कागजी

नोट मुद्रा की तरह स्वीकार किए जाते थे। ख्1,

  1. देखें एंड्रीएडस कृत ‘हिस्ट्री ऑफ दि बैंक ऑफ दि इंग्लैंड’ पृष्ठ 198