182 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(3) बैंक ऑफ इंग्लैंड स्वर्ण या मर्केंटाइल बिलों के बदले नोट देने को तैयार रहता था पर नोटों के बदले स्वर्ण नहीं देता था, अर्थात् नोट अपरिवर्तनीय मुद्रा थे जो असीमित मात्रा में जारी किए जाते थे। केवल एक ही मामले में यह असमानता अपूर्ण लगती थी। भारत सरकार यह वचन देती थी। यहां यह बात नोट करने की है कानूनी दायित्व के रूप में नहीं बल्कि कार्यपालिका की इच्छा के अनुसार यदि विनिमय दर निर्धारित अंकित दर से कम हो जाए तो वह विदेशी प्रेषण के लिए निश्चित दर पर रुपयों के बदले स्वर्ण दे देगी। परंतु सस्पेंशन अवधि में बैंक ऑफ इंग्लैंड ने ऐसा नहीं किया था। अब सारे प्रश्न का दारोमदार इस बात पर निर्भर करता है है कि क्या यह परिवर्तनीयता इतनी अधिक है कि भारतीय मुद्रा को संस्पेशन अवधि की इंगलिश मुद्रा से भिन्न समझा जाए और दोनों प्रणालियों के बीच की समानता को स्वीकार न किया जाए। इस बारे में कोई निश्चित फैसला करने से पहले हमें यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि इस परिवर्तनीयता का विशेष महत्व क्या है? अपरिवर्तनीय मुद्रा के प्रति हमारा दुराग्रह इतना प्रबल होता है कि लोग किसी भी ऐसी प्रणाली से संतुष्ट हो जाते हैं जिसमें चाहे बहुत कम मात्रा में हो, पर परिवर्तनीयता हो अवश्य। परंतु यह दृष्टिकोण एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न को अत्यंत गौण बना देता है। हमें अपने दिमाग में इस बारे में बिल्कुल साफ होना चाहिए कि परिवर्तनीय मुद्रा और अपरिवर्तनीय मुद्रा में अंतर क्या होता है। आमतौर पर जो अंतर बताया जाता है, वह यह है कि एक तो स्वतः चालित होती है और दूसरी की व्यवस्था करनी पड़ती है। परंतु यह एक बड़ी भारी गलती है और इसे स्वीकार नहीं करना चाहिये। परंतु व्यवस्था की जाने वाली मुद्रा से हम समझते हैं कि उसे जारी करना, जारी करने वाले के विवेक पर निर्भर करता है, इसलिए परिवर्तनीय मुद्रा की भी उतनी ही व्यवस्था करनी पड़ती जितनी एक अपरिवर्तनीय मुद्रा की। दोनों में भेद इस बात में होता है कि परिवर्तनीय मुद्रा की व्यवस्था में मुद्रा जारी करने के विवेक का विनियमन होता है जबकि अपरिवर्तनीय मुद्रा जारी करने के पीछे विनियमन नहीं होता। पर विनियमित होने के बावजूद मुद्रा जारी करना विवेक पर निर्भर करता है और उस हद तक परिवर्तनीय मुद्रा भी उतनी सुरक्षित नहीं होती कि उसे अपरिवर्तनीय मुद्रा से बिल्कुल ही अलग मान लिया जाए, इसमें वृद्धि करना क्योंकि विवेक पर निर्भर करता है इसलिए उसका प्रभाव यह पड़ता है कि स्वर्ण और चांदी की मुद्रा प्रचलन से निकल जाते हैं और इस तरह एक परिवर्तनीय मुद्रा भी अपरिवर्तनीय बन जाती है। इस तरह अंततोगत्वा परिवर्तनीय और अपरिवर्तनीय मुद्रा में अंतर