5. स्वर्ण मानक से स्वर्ण विनिमय मानक तक - Page 199

184 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विनिमय दर गिरने के बाद भी यह अधिस्थगन हटा लिया जाएगा। हो सकता है कि यह न हटाया जाए, क्योंकि यह कानून पर नहीं, बल्कि अंतर्विवेक पर निर्भर करता है। ख्1, यदि कोई परिवर्तनीयता शब्द का ही शौकीन हो तो क्या परिवर्तनीयता की यह श्रेणी सस्पेंशन पीरियड के नोटों की अपरिवर्तनीयता से कुछ भिन्न है? जो लोग ऐसा कहना चाहते हैं, वे भले ही कहते रहें। जो व्यक्ति बारीकियों को नहीं समझता उसे इस परिवर्तनीयता और पूर्ण अपरिवर्तनीयता के बीच अंतर इतना कम लगेगा कि वह यह नहीं समझ सकेगा कि इन दोनों में बहुत अधिक अंतर है। जब हम भारत में और भारत के बाहर कीमतों की समस्या का विश्लेषण करते हैं तो हम देखते हैं कि इन दोनों में कोई भेद नहीं और व्यावहारिक तौर पर दोनों में बहुत समानता है।

तथापि यह कहा जा सकता है कि एक अपरिवर्तनीय मुद्रा की व्यवस्था इतनी अच्छी तरह चलाई जाए कि इसमें स्वर्ण को कोई वरीयता नहीं मिलती जिसके फलस्वरूप इसमें और पूर्णतः परिवर्तनीय मुद्रा में से चुनाव करने के लिए कुछ नहीं बनता। पंरतु क्या एक अपरिवर्तनीय मुद्रा की व्यवस्था इतने अच्छे ढंग से चलाई जा सकती है? यह तो उसके वास्तविक कामकाज पर निर्भर करेगा और फिर क्या केवल स्वर्ण मुद्रा पर वरीयता न मिलने से ही अपरिवर्तनीय मुद्रा को परिवर्तनीय मुद्रा के

  1. वायसराय की कौंसिल के वित्त सदस्य ने अपने 1908-9 के वक्तव्य (पृष्ठ 23, इटेलिक्स वाले वाक्य

मूल नहीं हैं) में कहा थाµ ‘‘यदि हम बिना किसी सीमा के (स्वर्ण की) मांग को पूरा कर देते, तो

स्वर्ण की सारी सप्लाई कुछ सप्ताह में ही समाप्त हो जाती........ इन कालमों से हमने अपने कानूनी

अधिकारों का सहारा लेना उचित समझा.......... हम रुपयों के बदले स्वर्ण को पौंड देने के लिए बाध्य

नहीं हैं जो हम केवल अपनी सुविधानुसार ही देंगे। इसलिए मुद्रा कार्यालयों को दिए गए अनुदेश कि

किसी व्यक्ति को एक दिन में जारी की गई स्वर्ण की मात्रा 10,000 पौंड से अधिक न हो।’’ इन शब्दों

का उपयोग सरकार का यह दृष्टिकोण बनाने के लिए किया गया था कि 1907 के संकट के समय

रुपये की परिवर्तनीयता के बारे में सरकार अपना दायित्व कितना समझती है? परिवर्तनीयता की मात्रा

क्योंकि प्रशासनिक विवेक का विषय है, यह कहना कठिन है कि व्यवहार में इसे किस हद तक लागू

किया जाता है। सरकारी साक्ष्य द्वारा जनता पर यह प्रभाव डालने की चेष्टा की गई है कि व्यावहारिक

तौर पर रुपया परिवर्तनीय है। यदि यही बात है तो इसे कानूनी रूप से परिवर्तनीय क्यों नहीं बना दिया

जाता। यदि यह व्यवहार में पूर्णतया परिवर्तनीय है, तो इसे कानूनी रूप में परिवर्तनीय बनाने पर सरकार

पर उससे ज्यादा दायित्व नहीं आ पड़े जितना सरकारी साक्ष्य के अनुसार सरकार ने पहले से उठा रखा

है। यह कहा जाता है कि सरकार ऐसा इसलिए नहीं करती कि विनिमय का सट्टा करने वाले इससे

गैर-वाजिब फायदा उठाने लगेंगे। परंतु वे ऐसा क्यों न करें। क्या वे अपने रुपयों के मालिक नहीं हैं?

तथापि इस बात को पूरी तरह नहीं समझा जाता कि इस सुरक्षात्मक रवैये का तात्पर्य यह है कि मुद्रा

‘‘संतृप्ति की स्थिति’’ के बाद भी इतनी अधिक मात्रा में जारी कर दी जाती है कि उसका मूल्य बिल्कुल

सीमांत पर पहुंचा रहता है जिस पर सट्टे के तत्व का फौरन प्रभाव पड़ता है।