स्वर्ण मानक से स्वर्ण विनिमय मानक तक
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समकक्ष समझा जा सकेगा? कीमतों के मामले में तो यह बात परिस्थितियों पर भी निर्भर करती है। इन सब प्रश्नों पर यथास्थान विचार किया जाएगा। ख्1, इस समय हम इस बात पर विचार कर रहे हैं कि अपरिवर्तनीय मुद्रा की अंतर्निहित संभावनाएं क्या होती हैं। यहां इतना कह देना पर्याप्त है कि स्वर्ण विनिमय प्रतिमान का नाम दे देने से भारतीय मुद्रा प्रतिमान की वास्तविक प्रकृति छिपाई नहीं जा सकती। इसका सार तब इस बात में है कि यद्यपि स्वर्ण असीमित वैध मुद्रा है, परंतु उसी के साथ-साथ एक अन्य प्रकार की न्यासीय मुद्रा चलाई जाती है जो करीब-करीब अपरिवर्तनीय होती है और उसमें असीमित वैध मुद्रा का गुण भी होता है।
यह देखने के लिए कोई बहुत गहराई में जाने की आवश्यकता नहीं कि इस व्याख्या के अनुसार भारत की वर्तमान मुद्रा प्रणाली उससे बिल्कुल उल्टी है जिसकी रूपरेखा भारत सरकार ने 1898 में प्रस्तुत की थी और जिसे फाउलर कमेटी ने पास किया था। ये दोनों उसी कारण से एक-दूसरे के विपरीत हैं जिस कारण इंग्लैंड में बैंक चार्टर एक्ट और बैंक सस्पेंशन एक्ट एक-दूसरे के विपरीत थे। इन दोनों अधिनियमों के अंतर्गत इंग्लैंड में मिश्रित मुद्रा थी जो आंशिक रूप में स्वर्ण की थी और आंशिक रूप से कागज की। अंतर यह था कि बैंक सस्पेंशन एक्ट के अंतर्गत स्वर्ण मुद्रा सीमित मात्रा में होती थी और कागजी मुद्रा असीमित मात्रा में_ जबकि बैंक चार्टर एक्ट में स्थिति इसकी उल्टी थी जिसमें कागजी मुद्रा सीमित थी और स्वर्ण की मुद्रा असीमित। इसी तरह भारत सरकार की मूल योजना में रुपये की मुद्रा सीमित होती थी और स्वर्ण की असीमित। वर्तमान प्रचलित प्रणाली में स्वर्ण की मुद्रा सीमित हो गई है और रुपये की असीमित बन गई है।
भारत सरकार ने मूल रूप में जिस विचार की कल्पना की थी, क्या वर्तमान प्रणाली से उसमें कोई सुधार हुआ है? उस योजना के बारे में एकमात्र आपत्ति यह थी कि उसमें रुपयों को अपरिवर्तनीय बना दिया गया था। ख्2, परन्तु क्या परिवर्तनीयता इतनी महत्वपूर्ण शर्त है और यदि है तो किन परिस्थितियों में। यह विचार निरर्थक-सा लगता है कि समय का मूल्य बनाए रखने के लिए परिवर्तनीयता आवश्यक है। क्या केलों का मूल्य बनाए रखने के लिए केलों को सेबों में बदलना जरूरी होता है। केलों
- जिन कारणों से रुपये के रूप में स्वर्ण को प्रीमियम मिलता है, उसके लिए अध्याय VI देखें। बिना
स्वर्ण के रूप में मुद्रा का मूल्यह्रास हुए, रुपये का मूल्यह्रास किन कारणों से हो सकता है, यह देखने
के लिए अध्याय VI का अंतिम भाग और अध्याय VII का प्रारंभिक भाग देखें। 2. लिंडसे और प्रोबिन, दोनों ने इसी आधार पर भारत सरकार की योजना की आलोचना की थी और
कहा था कि उनकी योजनाएं कम से कम इस दृष्टि से श्रेष्ठतर थी कि उनमें किसी न किसी रूप में
परिवर्तनीयता का अर्थ था।