5. स्वर्ण मानक से स्वर्ण विनिमय मानक तक - Page 201

186 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

का मूल्य इस कारण से बना रहता है कि केलों की मांग होती है और उनकी पूर्ति सीमित होती है। यह मानने का कोई कारण नहीं कि मुद्रा इस नियम का अपवाद होती है। हमें तो केवल इसी बात की अधिक चिंता है कि मुद्रा का मूल्य केलों की अपेक्षा अधिक स्थिर बना रहे क्योंकि मुद्रा तो कीमतों का सामान्य माप होता है। मुद्रा का मूल्य बनाए रखने के लिए या किसी भी चीज का मूल्य बनाए रखने के लिए जरूरी होता है कि उसकी आपूर्ति प्रभावकारी ढंग से सीमा में रखी जाए। परिवर्तनीयता इसलिए उपयोगी नहीं होती क्योंकि इससे मुद्रा का मूल्य बना रहता है। यह तो मूर्खतापूर्ण बात है, बल्कि इससे मुद्रा की आपूर्ति पर अंकुश लगा रहता है, उसकी सीमा बंधी रहती है। परंतु इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए परिवर्तनीयता एकमात्र उपाय नहीं है। यदि किसी प्रणाली में मुद्रा जारी करने की उच्चतम सीमा निर्धारित कर दी जाती है, तो उसका भी वही प्रभाव पड़ता है अपितु कहीं ज्यादा प्रभाव पड़ता है। अब यदि टकसाल रुपये के सिक्के ढालने के लिए पूरी तरह बंद कर दी जाएं तो मुद्रा जारी करने की उच्चतम सीमा निर्धारित हो जाएंगी और ऐसे अपरिवर्तनीय रुपये से परिवर्तनीयता के सभी उद्देश्य पूरे हो जाएंगे। अपितु उससे भी ज्यादा उद्देश्य पूरे हो जाएंगे। ऐसा अपरिवर्तनीय रुपया उस छद्म परिवर्तनीय रुपये से कहीं ज्यादा प्रभावशाली होगा जो भारत में चल रहा है। ख्1, उच्चतम सीमा निर्धारित होने पर रुपये का मूल्य गिरने का कोई खतरा नहीं रहेगा। यदि कोई खतरा था तो वह यह था कि रुपये का मूल्य काफी बढ़ जाता। परंतु स्वर्ण की सामान्य वैध मुद्रा बना कर इस खतरे से बचा लिया गया है। उच्चतम सीमा निर्धारित करने का दूसरा प्रभाव यह होता कि इसकी व्यवस्था करने की जरूरत ही न रहती क्योंकि मुद्रा जारी करने की मात्रा का प्रश्न तो एक बार ही हल हो गया होता।

इसलिए इन मामलों में स्वर्ण विनिमय मानक अपरिवर्तनीय रुपये की मूल योजना का बिगड़ा हुआ रूप है जिसमें जारी की गई एक निश्चित मात्रा की प्रतिपूर्ति स्वर्ण से की जाती है और फिर मूल्य स्तर निर्धारित करने की दृष्टि से भी विनिमय मानक मूल योजना से अधिक अच्छा नहीं है। यह भले ही कहा जा सकता है कि मूल योजना को इस तरह विकृति करना कोई खेद की बात नहीं। चाहे स्वर्ण मूल्य का प्रतिमान हो या न्यासीय मुद्रा मूल्य का प्रतिमान हो, दोनों से ही कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि दोनों ही मूल्य का स्थिर प्रतिमान प्रदान नहीं कर सकते। स्वर्ण प्रतिमान भी

  1. लिम्पिंग स्टैंडर्ड की एक्सचेंज स्टैंडर्ड से तुलना करते हुए लगता है कि प्रो. फिशर ने इन बातों की पूरी

तरह अनदेखी कर दी है। देखें उनकी पुस्तक ‘परचेजिंग पावर..... 1911 पृष्ठ 131-32