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स्वर्ण मानक से स्वर्ण विनिमय मानक तक

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कागजी प्रतिमान जितना अस्थिर सिद्ध हुआ है क्योंकि दोनों ही संकुचन और प्रसार के प्रति बहुत संवेदनशील हैं। निस्संदेह यह सब सच है। तथापि यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि किसी भी मुद्रा प्रणाली में अनिश्चित संकुचन का कोई खतरा नहीं होता। ख्1, जिस बात पर ध्यान देने की जरूरत है, वह यह है कि अनिश्चित विस्तार की सीमा से बचा जाए। परंतु अनिश्चित विस्तार की संभावना मुद्रा की प्रकृति के अनुसार बदलती रहती है। जब मूल्य का प्रतिमान स्टैंडर्ड धातु की मुद्रा हो तो उसका बहुत अधिक विस्तार नहीं हो सकता क्योंकि उत्पादन की लागत के कारण पर्याप्त सीमाबन्दी हो जाती है। जब मूल्य का प्रतिमान परिवर्तनीय कागजी मुद्रा हो तो आरक्षित भंडार संबंधी उपबंधों के कारण इस विस्तार पर रोक लग जाती है। परंतु जब मूल्य का प्रतिमान ऐसी मुद्रा होती है जिसका मूल्य उसकी लागत से अधिक होता है और अपरिवर्तनीय होती है तो खतरा हो जाता है कि उसका अनिश्चित रूप से विस्तार हो सकता है जो मूल्य”ास या मूल्य वृद्धि का दूसरा नाम है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि बैंक चार्टर एक्ट से बैंक रेस्ट्रिक्शन एक्ट में कोई सुधार नहीं हुआ। वास्तव में यह एक बड़ा सुधार था। इसने एक ऐसी मुद्रा प्रतिस्थापित की जिसका कम विस्तार होता था जबकि दूसरी मुद्रा का कहीं अधिक विस्तार हो सकता था। अब रुपया एक ही सिक्का है, अपरिवर्तनीय है और असीमित वैध मुद्रा है। ख्2, इस तरह यह एक ऐसी मुद्रा है जिसमें अनिश्चित विस्तार की संभावना अंतर्निहित है अर्थात् मूल्य”ास की और मूल्य वृद्धि की। इस स्थिति से बचने के लिए पिछली मूल योजना निश्चय ही बेहतर थी जिसमें कहा गया था कि रुपये जारी करने की सीमा तय कर दी जाए ताकि भारतीय मुद्रा प्रणाली इंगलिश प्रणाली के अनुरूप हो जाए तो 1844 के बैंक चार्टर एक्ट के अंतर्गत संचालित की जाती है।

  1. देखें हॉट्रे, आरजी, अध्याय 1

  2. यह समझना कठिन है कि भारतीय मुद्रा विषय पर लिखने वाले कुछ लेखक इस तथ्य को स्वीकार क्यों

नहीं कर लेते। देखेंः इंडियन इकोनॉमिक्स एसोसिएशन की वार्षिक बैठक में मि. मदन के शोध प्रबंध

पर चर्चा (इंडियन जर्नल ऑफ इकोनॉमिक्स, खंड III, भाग-4, सीरियल नं.12, पृष्ठ 560) यह सच

है कि रुपये की हीनता अब उतनी स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं होब रही जितनी उस समय होती जब इसका

वजन वही रखा जाता और इसे और अधिक ही (बेसर) बना दिया जाता, या इसकी शुद्धता उतनी ही

रखी जाती और उसे हल्का बनाया जाता। परंतु जैसा कि हैरिस ने अपनी पुस्तक ‘‘ऐसे अपौन मनी एंड

कायंस (भाग II, अध्याय I, पैरा 8) में बताया हैµ टकसाल में या स्वयं सिक्कों में कोई परिवर्तन किए

बिना मुद्रा का मूल मापदंड बदल दिया जाए’’ जैसे मान लीजिए नौ पैसे को या नौ पैसे में जितनी चांदी

है, उसे शिलिंग कहा जाए और यह मूल्य का ह्रास करने का एक तरीका है जो रुपये से भिन्न नहीं

है, और वास्तव में मूल्य का ह्रास करने के अन्य दो तरीके जैसे ही हैं। इस तरह देखने से इस निष्कर्ष

से नहीं बचा जा सकता कि रुपया एक खोटा सिक्का है।