214 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बढ़ाने की समस्या में अंतर करने में असफल रही। बाद वाला हल तभी व्यावहारिक था जब रुपये के मूल्य में वृद्धि हो जाती। परंतु हुआ यह कि रुपये की तुलना में चांदी की मूल्य वृद्धि हो गई। इसलिए एकमात्र संभव उपाय यह था कि रुपये की प्रस्तावित शुद्धता में कमी कर दी जाती। यदि कमेटी किसी भी अन्य वस्तु की तरह चांदी को रुपये से अलग वस्तु के रूप में मान कर चलती जिसका मूल्य रुपये में आंका जाता तो शायद वह ऐसी भीषण भूल न करती जो उसने कर दी थी। परंतु अधिक संभावना इस बात की है कि कमेटी ने यह कभी नहीं सोचा कि जिस बारे में कमेटी की रिपोर्ट देने के लिए कहा गया था, उसमें रुपयों की क्रय शक्ति का भी कोई महत्व हो सकता है। उसकी राय में तो महत्वपूर्ण बात यह थी कि रुपये का मूल्य बनाए रखने के लिए व्यापार संतुलन पक्ष में होना चाहिए और जब कमेटी ने रिपोर्ट का प्रारूप तैयार किया तब व्यापार संतुलन पक्ष में था। कमेटी ने विनिमय प्रतिमान के बारे में आम टिप्पणी करते हुए कहा थाःµ
‘‘यह प्रणाली इस दृष्टि से प्रभावकारी सिद्ध हुई है कि रुपये का मूल्य
1 शिलिंग 4 पैंस से नीचे नहीं गिरा और जब तक अनुकूल व्यापार संतुलन
वाले एक निर्यातक देश के रूप में भारत की स्थिति में कोई विशेष जोरदार
परिर्वतन नहीं होता, तब तक यह समझने का कोई कारण नहीं कि स्थिति
बुरी तरह बिगड़ जाएगी। ख्1, ’’
जब कमेटी ने इस दृष्टिकोण से प्रश्न पर विचार किया तो उसका यह तर्क देना बिल्कुल स्वाभाविक था कि यदि 1 शिलिंग स्वर्ण विनिमय पर व्यापार संतुलन अनुकूल बनाए रखा जा सकता है तो 2 शिलिंग स्वर्ण विनिमय पर क्यों अनुकूल नहीं बनाए रखा जा सकता?
और फिर यह निश्चय ही ऐसा अनुमान जो इस बात को स्पष्ट कर सकती है कि समिति की सिफारिशों को तब अपनाया गया जब उनके अपनाने की आवश्यकता ही खत्म हो गई थी। यदि रुपये का वास्तविक मूल्य उसके अंकित मूल्य से अधिक होता तो भी ऐसा कोई खतरा नहीं था कि रुपया प्रचलन से पूरी तरह लुप्त हो जाता क्योंकि भारत में रुपया भारी मात्रा में प्रचलन में है। ख्2, तब जो होता, वह यह नहीं था कि थोक ढंग से रुपयों को पिघलाया जाता बल्कि धीमे-धीमे और गैर-कानूनी ढंग से भारत सरकार के जारी आदेश का उल्लंघन किया जाता कि रुपये के सिक्के पिघलाए न जाएं या उनका निर्यात न किया जाए। जिस समय (दिसम्बर 1919 में) कमेटी ने रिपोर्ट दी उस समय चांदी की कीमत निस्संदेह अधिक थी। परंतु जब सरकार ने इस
रिपोर्ट पैरा 33
देखें 1919 की कमेटी के समक्ष मि. केन्स का साक्ष्य पृ. 2665-68