विनिमय मानक की स्थिरता
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रिपोर्ट पर कार्रवाई की (सन् 1920 में) तो चांदी की कीमतें गिरने लगी थीं। असल में 31 अगस्त, 1920 को जब कौंसिल में रुपये का स्वर्ण मूल्य परिवर्तित करने का विधेयक पेश किया गया तब सोना 23 ¼ रुपये प्रति तोला के हिसाब से बिक रहा था, और जब कि सावरेन 10 रुपये के समान था तो सोने का बाजार भाव 15 रु. 14 आने प्रति तोला होना चाहिए था ताकि रुपये के स्वर्ण से बाजार अनुपात और नए टकसाल अनुपात में 7 ½ रुपये या 33 प्रतिशत का अंतर होता। और फिर चांदी की कीमत भी गिर कर 44 पैंस के आसपास पहुंच गई थी। इसलिए इस बात का कोई
खतरा नहीं था कि रुपये के सिक्कों को पिघला दिया जाता और इस तरह वे प्रचलन में न रहते। ख्1, परंतु इस अंतर के बावजूद सरकार ने रुपये का अधिक ऊंचा सम-मूल्य रखने में जल्दबाजी की। तथापि जल्दबाजी भरे इस कदम के पीछे का वित्तीय कारण स्पष्ट था। निकट भविष्य में जो संवैधानिक परिवर्तन होने जा रहे थे उनके अंतर्गत ब्रिटिश भारत में प्रांतीय और शाही या इम्पीरियल वित्त को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग कर दिया जाना था। वित्त की पुरानी प्रणाली के अंतर्गत सरकार यदि चाहे तो प्रांतीय सरकारों पर अंशदान के रूप में नजराना लगा सकती थी ताकि ऐसी अत्यावश्यक आवश्यकताएं पूरी की जा सकें जिन्हें वह अपने साधनों से पूरा नहीं कर सकती थीं। इसके अतिरिक्त हर बार प्रांतीय वित्त तय करते समय भी सबसे बड़ा भाग ले लिया करती थी। नए संविधान में उसे उस शक्ति से वंचित कर दिया जाना था। इसलिए सरकार राहत के किसी ऐसे स्रोत की खोज में थी जो किसी पर विशेष कर के समान न लगे। ऐसा करने के लिए ऊंची विनिमय दर एक बड़ा सुखद साधन था क्योंकि हिसाब लगाया गया था कि इससे होम चार्जेज या घरेलू प्रभार में बड़ी बचत हो जाती। परंतु मान लीजिए कि वित्तीय दृष्टिकोण से ऊंची विनिमय दर रखना वांछनीय था तो भी सवाल यह था कि इसे बनाए कैसे रखा जाए ख्2, जिस से सरकार कमेटी की रिपोर्ट पर कार्रवाई करने लगी, न केवल चांदी की कीमतें गिर गई थी और स्वर्ण के रूप में रुपये का भी स्पष्टतया मूल्य ”ास हो गया था अपितु बाजार संतुलन भी भारत के प्रतिकूल हो गया था। किन्तु असामान्य जल्दबाजी में बनाया गया यह कानून इस आशा से बनाया गया था कि कुछ समय बाद व्यापार संतुलन अनुकूल हो जाएगा जो रुपये का मूल्य 2 शिलिंग स्वर्ण पर बनाए रखने में मददगार होगा। उक्त कथन सरकारी गणना की सही व्याख्या है, यह उस पत्र से स्पष्ट हो जाता है जो सरकार ने बंगाल
- माननीय मि.टाटा का इंडियन काएनेज अमेंडमेंट बिल पर भाषण_ खंड 59 पृष्ठ 112
- भारतीय विनिमय पर हाल की चर्चाओं में इस बात को पूरी तरह ओझल कर दिया गया है कि भारतीय
विनिमय को 2 शिलिंग स्वर्ण तक बढ़ाने के पीछे यह उदे्दश्य था। परंतु 10 मार्च 1920 को रिवर्स
कौंसिल्स के बारे में प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लेते हुए वित्त सदस्य ने यह बात बिल्कुल स्पष्ट कर दी
थी। एल.एल.सी.पी. खंड 58 पृष्ठ 1292