रुपये की समस्या : इसका उद्भव और समाधान - Page 24

प्रथम संस्करण की भूमिका 9

थी जिसने स्वर्ण मानक की सिफारिश करते समय यह भी सिफारिश की और इस प्रकार हडौल समिति की मूर्खता को स्थायित्व प्रदान किया कि सरकार सबसे सहज मुद्रा सिद्धांतों के अनुसार जनता की आवश्यकताओं के लिए अपने ही खाते से रुपए की ढलाई करे, बिना इस बात को समझे कि बाद की सिफारिश पहले की सिफारिश की विध्वशंक है। वास्तव में जैसा कि मैं तर्क देता हूं कि फाउलर समिति के सिद्धांतों को त्याग देना चाहिए यदि हमें भारतीय मुद्रा को स्थायी आधार पर रखना है।

मुझे इस बात का आभास है कि इस संबंध में मैंने अपने लेख में मुद्रा के सिद्धांतों पर एक प्रकार से लंबी बहस की है। इस प्रक्रिया को अपनाने का औचित्य दोहरा है। सर्वप्रथम मैं भारतीय मुद्रा के बारे में अन्य लेखकों के विचारों से इतना अधिक असहमत हूं कि मेरे लिए यह आवश्यक हो गया है कि मैं अपने दृष्टिकोण को सिद्ध करूं भले ही मुझे इस बात का दोषी बनना पड़े कि मैंने तथ्यों को आवश्यकता से अधिक विस्तारपूर्ण बनाया। परंतु यह मेरा दूसरा न्याय संगत तर्क है जो मुझे इस बात की अधिक छूट देता है। यह बात इस तथ्य में निहित है कि मैंने प्राथमिक रूप से भारतीय जनता के लाभ के लिए लिखा है क्योंकि मुद्रा- सिद्धांतों में उनकी पकड़ इतनी अच्छी नहीं है, जितनी होनी चाहिए। अतः इस बात पर सहमति होगी कि ऐसे विषय पर अपने विचारों की पुष्टि में युक्तिसंगत के लिए जिस पर मेरे निष्कर्ष आधारित हैं। कम लिखने की अपेक्षा विस्तार से लिखना अधिक श्रेयकर है।

1913 तक भारतीय मुद्रा के विषय में स्वर्ण विनिमय-मानक भारत सरकार द्वारा स्वीकृत लक्ष्य नहीं था और यद्यपि उस वर्ष में नियुक्त चेम्बरलेन कमीशन ने इसे बनाए रखने के पक्ष में रिपोर्ट दी थी फिर भी इस बारे में भारत सरकार ने युद्ध समाप्त होने तक इन सिफारिशों को कार्यान्वित न किए जाने के लिए वचन दिया था और जनता को यह अवसर दिया था कि जनता इस बारे में अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करे। फिर भी जब विनिमय-मानक गत युद्ध के दौरान अपने आधार समेत हिल गया था तो भारत सरकार अपने वचन से विमुख हो गयी और बार-बार विरोध प्रकट करने पर भी स्मिथ समिति के विचारणीय विषय को सीमित दायरे में कर दिया। ऐसे कानून बनाने के लिए कहा गया जो विनिमय-मानक के स्थायित्व को सुनिश्चित करने के लिए उपयोगी सिख हो। मानो उस मानक को भारतीय मुद्रा के विषय के बारे में अंतिम रूप समझा गया हो। अब चूंकि स्मिथ समिति के उपायों ने विनिमय-मानक के स्थायित्व को सुनिश्चित नहीं किया है, अब मालूम हुआ है कि सरकार और जनता भारतीय मुद्रा पद्धति को ठोस आधार पर रखने के इच्छुक है। इस समय मेरे लिए इस पुस्तक के प्रकाशन का उद्देश्य यह है कि इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए आधार प्रस्तुत किया जाए।