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विनिमय मानक की स्थिरता

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है, उसे ‘‘संतुल्य’’ क्यों कहा जाता है? कोई व्यक्ति व्यापार संतुलन को छुरी-कांटे या किसी अन्य वस्तु के रूप में भी दिखा सकता है। दो देशों के व्यापारिक सौदों के बीच धन की जितनी मात्रा होती है, वह किसी भी अन्य वस्तु की तरह सापेक्ष मूल्यों के नियम पर आधारित होती है। यदि देश से पहले की अपेक्षा अधिक धन बाहर जाता है तो इसका सीधा-सादा मतलब यह है कि यह अन्य वस्तुओं की अपेक्षा सस्ता हो गया है। परंतु यदि प्रतिकूल संतुलन कोई चीज होती है अर्थात् वस्तुओं का आयात वस्तुओं के निर्यात से बढ़ जाता है, तो फिर अगला सवाल यह पैदा होता हैµनिर्यात क्यों गिरते हैं और आयात क्यों बढ़ जाते हैं? दूसरे शब्दों में यदि व्यापार में साम्यावस्था बनी रहती है तो व्यापार संतुलन प्रतिकूल कैसे होता है? इस बात की कोई सरकारी व्याख्या नहीं है। वास्तव में सरकारी कागजों में इस प्रकार के प्रश्न की कल्पना ही नहीं की जाती। परंतु यह तो एक मूलभूत प्रश्न है। उल्लिखित आधार पर प्रतिकूल व्यापार संतुलन यह कहने का एक दूसरा अंग है कि वह देश एक ऐसा बाजार बन गया है जहां बेचना तो अच्छा है और खरीदना बुरा है। अब एक बाजार बेचने के लिए अच्छा है और खरीदने के लिए बुरा तब होता है जब उस बाजार में कीमतें बाहर की कीमतों के स्तर से अधिक होती हैं। इसलिए यदि प्रतिकूल व्यापार संतुलन विनिमय में गिरावट का कारण होता है और यदि व्यापार संतुलन प्रतिकूल इसलिए होता है कि आंतरिक कीमतें बाहरी कीमतों की अपेक्षा अधिक होती हैं, तो इसका यह निष्कर्ष निकलता है कि विनिमय में गिरावट मुद्रा की शक्ति में गिरावट के अतिरिक्त और कुछ नहीं है और कीमतें बढ़ने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। प्रतिकूल व्यापार संतुलन की व्याख्या निर्णायक कारक से बास एक कदम पहले ही व्याख्या होती है। इस समस्या को कोई किसी भी तरह रोकना चाहे, इस निष्कर्ष से नहीं बचा जा सकता कि रुपये के विनिमय मूल्य में गिरावट रुपये की क्रय शक्ति में गिरावट के परिणामस्वरूप होती है।

अब रुपये की क्रय शक्ति में गिरावट का क्या कारण है? रिपोर्ट ऑफ प्राइस इनक्वायरी कमेटी ख्1, यदि उपहास नहीं तो एक भ्रामक प्रपत्र जरूर है। उसमें अन्य कारणों ख्2, के साथ-साथ भारत में मूल्य वृद्धि का एक कारण यह भी बताया गया था कि

  1. यह कमेटी 1910 में भारत में कीमतों में वृद्धि की जांच करने के लिए नियुक्त की गई थी और इसके

सदस्य सर्वश्री दत्त, शिवराज और गुप्ता थे। इसके पहले और अंतिम कमीश्नर भारत सरकार के वित्त

विभाग के सदस्य थे। इसलिए इस कमेटी को कमोबेश सरकारी कमेटी माना जा सकता है। इस कमेटी

की जांच के परिणाम 1914 में 5 खंडों में प्रकाशित किए गए। इसमें पहले खंड की रिपोर्ट पर मि. दत्ता

के हस्ताक्षर हैं।

  1. देखें रिपोर्ट, पैरा 126-27