218 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जनसंख्या के मुकाबले माल की पूर्ति में कमी आई है। अब आमतौर पर यह सिद्धांत स्वीकार किया जाता है कि मूल्य निर्धारित करने का मुख्य कारण मुद्रा की मात्रा होता है, इसलिए कमेटी ने जो कारण बताया है, वह कुछ विचित्र-सा लगता है। परंतु, इस बात को समझने के पर्याप्त कारण हैं कि कमेटी ने कीमतों में वृद्धि की यह अद्भुत व्याख्या क्यों दी। भारतीय मुद्रा की व्यवस्था में सरकारी की स्थिति कुछ संवेदनशील है। कागजी मुद्रा जारी करने का प्रश्न पहले से ही सरकार के हाथों में था। टकसाल बंद करने से इसने रुपये की मुद्रा की व्याख्या भी अपने हाथों में ले ली । अब चूंकि रुपये के सिक्कों और कागजी मुद्रा अर्थात् पूरी मुद्रा का नियंत्रण सरकार ने अपने हाथों में ले लिया है, इसलिए मुद्रा के जो भी परिणाम निकलेंगे, सरकार उसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार होगी। तथापि यह नहीं भूल जाना चाहिए कि सरकार पर प्रतिपक्ष बड़ी बुद्धिमत्तापूर्ण हमले करते रहा और व्यंग्य बाणों में कमी नहीं करते। इस स्थिति के परिणामस्वरूप सरकार बहुत सावधानीपूर्वक चली है और बहुत सावधानीपूर्वक ही किसी बात को स्वीकार करती है। हार्नर के 1811 के प्रस्ताव पर वाद-विवाद में भाग लेते हुए लार्ड कैसलरीग ने कहा था कि जरूरत से ज्यादा जारी किए जाने के कारण बैंक नोटों का मूल्य ”ास हो गया है और हाउस ऑफ कॉमन्स से पूछा था कि भले ही यह एक तथ्य हो परंतु यदि सदन यह स्वीकार कर लेता कि मूल्य ”ास है तो नेपोलियन क्या करता । भारत सरकार भी उसी स्थिति में है और उसे सोचना चाहिए कि यदि उसने यह या वह सिद्धांत स्वीकार कर लिया तो प्रतिपक्ष क्या करेगा। भारत सरकार के यह स्वीकार करने का यह कारण है कि प्रतिकूल व्यापार संतुलन से ही विनिमय में गिरावट आई है। जिस तरह कमेटी ने यह कहा है कि कीमतें माल की कमी के कारण बढ़ी हैं इन दोनों सिद्धांतों की व्याख्या में एक साझी बात यह है कि इसमें घटनाओं को सरकारी नियंत्रण से बाहर बताया गया है और इस तरह सरकार को किसी भी आरोप से बचा लिया गया है जो उस पर लगाया जा सकता था। यदि व्यापार संतुलन प्रतिकूल हो जाए तो सरकार क्या कर सकती है? और यदि वस्तुओं की सप्लाई कम हो जाए तो क्या यह सरकार का दोष है? सरकार ऐसे भारी कवचों के अंतर्गत सुरक्षित रह सकती है। ख्1, परंतु क्या कमेटी द्वारा दी गई व्याख्या के कारण यह व्याख्या गलत मान ली जाए कि भारत में कीमतों में वृद्धि का कारण मुद्रा की मात्रा
- तथापि यहां यह नोट किया जाना चाहिए कि वस्तुओं की कमी की जो व्याख्या सरकार को इस इलज़ाम
से मुक्ति देने के लिए गई थी कि उसने मुद्रास्फीति की है, सरकार ने स्वयं अपने एक प्रस्ताव में उसका
प्रतिवाद किया जिसमें कमेटी की रिपोर्ट की विवेचना की गई थी क्योंकि इसे स्वीकार करने का मतलब
निकाला जा सकता था कि इस सरकार के अंतर्गत भारत दरिद्र होता जा रहा है। परंतु अपनी जल्दबाजी
में सरकार ने यह नहीं देखा कि यदि इस सिद्धांत का भी प्रतिवाद कर दिया जाए तो भारत में कीमतों
की वृद्धि के लिए एक ही कारण बना रहेगा कि मुद्रा जारी करने से इसकी मात्रा बढ़ा दी गई थी।