विनिमय मानक की स्थिरता
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में बढ़ोत्तरी था। धन का मूल्य मुद्रा और वस्तुओं के (विनिमय के) ख्1, एक समीकरण के परिणाम पर आधारित होता है। इस समीकरण के दो पहलू हैंµमुद्रा का पहलू और वस्तुओं का पहलू। अर्थशास्त्रियों में यह विवाद युगों से चला आ रहा है कि जब विनिमय के समीकरण के परिणाम में परिवर्तन होता है अर्थात् जब आय मूल्य स्तर में परिवर्तन आता है, तो इन दोनों में से निर्णायक कारण कौन-सा होता है? कुछ अर्थशास्त्री धन के मूल्य का सामान्य शक्ति पर विचार करते समय समीकरण में धन के पहलू की अपेक्षा वस्तुओं के पहलू पर जोर देते हैं और उसे निर्णायक समझते हैं। उनके अनुसार यदि कीमतों में आम गिरावट आती है तो हो सकता है कि यह धन की कमी के कारण न हो अपितु वस्तुओं की पूर्ति में अधिकता के कारण हो । इसी तरह यदि कीमतों में आम वृद्धि होती है तो यह धन की मात्रा में अधिकता की जगह वस्तुओं की मांग में कमी के कारण हो सकता है। इस ढंग से विचार किया जा सकता है जैसा कि कुछ अर्थशास्त्रियों ने अपनाया था, परंतु यह कल्पना करना कि धन की मात्रा का सिद्धांत ही गलत सिद्ध हो गया है, एक गलती ही होगी। वास्तव में यह मत अपना कर धन की मात्रा के सिद्धांत को रत्ती भर भी हानि नहीं पहुंचा रहे हैं। वह उसी को अलग ढंग से व्यक्त कर रहे हैं। उनके इस मत में कमजोरी यह
है कि इसमें यह बात ध्यान में नहीं रखी गई कि यदि वस्तुओं की अधिकता अथवा कमी में उसी के साथ-साथ मुद्रा को शामिल कर लिया जाए तो आय मूल्य स्तर पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। यदि वस्तुओं की मात्रा बढ़ जाए जिसमें मुद्रा की बढ़ी हुई मात्रा भी शामिल हो, तो इस बात का कोई कारण नहीं कि आम कीमतों का आय स्तर क्यों गिर जाए। इसी तरह यदि वस्तुओं की मात्रा और उसी के साथ मुद्रा की मात्रा भी घट जाए तो इस बात का कोई कारण नहीं कि कीमतों का स्तर क्यों गिर जाए। इसी तरह यदि वस्तुओं की मात्रा घट जाए और इसी के साथ मुद्रा की मात्रा भी घट जाए तो इस बात का कोई कारण नहीं कि आम कीमतों क्यों बढ़ जाए। यदि वस्तुओं के रूप में व्याख्या की जाए, तो यह धन के मूल्य की मात्रा व्याख्या का उलटा नहीं है, जो कुछ ऊपर कहा गया है, उसे देखते हुए कमेटी के तर्क को बिना उसकी भाषा बदले हुए इस रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है कि भारत में कीमतों में वृद्धि इसलिए हुई कि वस्तुओं की पूर्ति में कमी आने के साथ-साथ मुद्रा की मात्रा में कमी नहीं आई। संक्षेप में रुपये की क्रय शक्ति इसलिए घटी क्योंकि मुद्रा आवश्यकता से अधिक मात्रा में जारी कर दी गई और इसमें बिल्कुल संदेह नहीं है कि 1893 में टकसालें बंद होने के बाद से भारत में भारी मात्रा में मुद्रा जारी की गई।
1893-98 की पहली अवधि अपेक्षाकृत एकमात्र ऐसी अवधि थी जिसमें मुद्रा के विस्तार के बारे में विशेष रूप से सावधानीपूर्वक नीति अपनाई गई थी। उसका
- कोष्ठक में दिए गए शब्द ‘‘प्राब्लम ऑफ रुपी’’ से ले कर डाले गए हैं।