6. विनिमय मानक की स्थिरता - Page 235

220 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कारण सर्वविदित है। उस समय टकसालें बंद कर दी गई थीं और मुद्रा पहले ही फालतू मात्रा में उपलब्ध थी। तथापि यह अवधि भी मुद्रा के विस्तार से पूरी तरह मुक्त नहीं थी। ख्1, जिस समय टकसालें बंद की गईं, उस समय लोगों के पास जो चांदी बुलियन थी, उनका चांदी का मूल्य घटने के कारण मूल्य ”ास हो गया। जिन लोगों का इसमें स्वार्थ था, उन्होंने एक आंदोलन शुरू कर दिया जिससे सरकार को उनकी हानि की भरपाई के लिए विवश किया जा सके। अंततोगत्वा सर जेम्स मैके (अब लार्ड इंचकेय) सरकार को इस बात के लिए तैयार करने में सफल हो गए कि सरकार बैंकों से चांदी ले ले। सर मैके वही व्यक्ति थे जिन्होंने सरकार को टकसालें बंद करने के लिए मजबूर किया। सरकार ने सैक्रेटरी ऑफ स्टेट को प्रस्ताव भेजा कि उसे हानि उठा कर भी, चांदी बेचने की अनुमति दी जाए बजाय इसके कि वह चांदी के सिक्के बनाए क्योंकि मुद्रा पहले ही फालतू मात्रा में बनी पड़ी है। चूंकि सैक्रेटरी ऑफ स्टेट ने इंकार कर दिया इसलिए चांदी के सिक्के बना लिए गए और मुद्रा की मात्रा और भी बढ़ गई। 1893-94 में कौंसिल बिलों की रोक से खजानों में अस्थायी तौर पर सिक्कों का बड़ा भंडार जमा हो गया था। इससे व्यवहारतः मुद्रा में संकुचन आ गया। परंतु बाद में सरकार ने फैसला किया कि यह धन रेलों के निर्माण पर व्यय कर दिया जाए। इस नीति से परोक्ष रूप से मुद्रा में वृद्धि हो गई। 1894 के बाद कौंसिल बिल पुनः चालू करने का भी वही प्रभाव पड़ा क्योंकि बिलों की बिक्री में अतिरिक्त मुद्रा सम्मिलित होती थी। क्योंकि घरेलू खजाने के लिए वित्त व्यवस्था करने के लिए स्वर्ण उधार लेने पर भारी लागत आई इसलिए बिक्री पुनः शुरू करना क्षम्य था। परंतु जो बात बिलकुल अक्षम्य थी, वह कागजी मुद्रा के अस्थायी या फिडुशियरी भंडार को 8 करोड़ रु. से 10 करोड़ ख्2, रुपये कर देना। इस तरह 2 करोड़ रुपये के सिक्के प्रचलन में आ गए विशेष कर इसलिए कि वित्त मंत्री ने इस बात पर विचार करने से ही इंकार कर दिया कि उसका मुद्रा नीति पर कोई प्रभाव पड़ेगा। उनका तर्क थाःµ

‘‘मुझे इस बारे में थोड़ा संदेह है कि मुद्रा के भंडार के निवेश के प्रश्न पर

विचार करते समय क्या हम इस प्रकार के बाहरी प्रभावों पर विचार कर सकते

हैं।’’ ख्3,

तथापि कुल मिला कर पहली अवधि में दूसरी अवधि (1900-1908) की तुलना में मुद्रा में वृद्धि नहीं के बराबर हुई। इस अवधि में सरकार ने प्रचलन में भारी मात्रा में मुद्रा डाल दी जिससे मुद्रा की मात्रा बेतहाशा बढ़ गई। इस अवधि में जो रुपये के

  1. देखें µएच.एम.एस. कृत ‘दी टाइम्स ऑफ दि स्टैंडर्ड’ कलकत्ता 1909 पृष्ठ 16-17

  2. 1896 के एक्ट XV के द्वारा

  3. फाइनेंशियल स्टेटमेंट 1896-97 पृष्ठ 89