विनिमय मानक की स्थिरता
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सिक्के बनाए गए, उसके बारे में मि. केन्स ने, जो सरकारी नीतियों का विरोध करने वाले आलोचक थे, लिखा ख्1,
‘‘सन 1900 में रुपये के सिक्कों का उल्लेखनीय पैमाने पर ढालना पुनः शुरू
कर दिया गयाµस्थिर वार्षिक मांग के फलस्वरूपµ1901-2 में मांग कम रही।
(1903-4 में अधिक थी परंतु असामान्य कभी भी नही थी।) इसलिए टकसालें
आराम से सिक्के ढाल कर कुछ समय आराम भी कर लेती थीं यद्यपि 1903-4
में उन्हें मामूली सी कठिनाई हुई। 1905-6 को मांग तेजी से बढ़ी और जुलाई,
1905 से तो गैर सिक्के वाली चांदी के सिक्के बनाने के बावजूद नई सप्लाई मांग
पूरी नहीं कर सकी। किन्तु यह थोड़ा-सा अभाव सरकार के सिर चकराने के लिए
काफी था। और एक बार जब उन्होंने तेजी से सिक्के बनाने शुरू किए तो फिर
वह बराबर वैसा ही करती गईµ बिना सामान्य बुद्धि का उपयोग करते हुए इस
बात की प्रतीक्षा किए बिना कि 1906-7 का व्यस्त मौसम कैसा बीतेगा, सरकार
गर्मी के महीनों में तेजी से सिक्के बनाती गई।....... 1906 की गर्मियों की तरह
सरकार 1907 की गर्मियों में भी सिक्के ढालती गई बिना कोई प्रतीक्षा किए कि
जब तक 1907-8 के मौसम की समृद्धि का आश्वासन नहीं मिल गया।’’
स्पष्टतः इस अवधि में सरकार ने अपनी नीति कुछ इस ढंग से बनाई कि जैसे ‘‘एक समाज में मुद्रा की खपत निरंतर भूख मिटाने के लिए ऐसे कर रही है जिस तरह अन्य समाजों में बीयर की खपत करते हैं।’’ इस अवधि में कागजी मुद्रा का भी काफी विस्तार हुआ। 1903 तक करेंसी नोटों का उपयोग सीमित था क्योंकि वे जारी वाले सर्कल करने बाहर वैध मुद्रा नहीं होते थे और फिर उनकी जगह केवल जारी किए जाने वाले सर्कल के दफतर से ही मिल सकती थी। भारत में कागजी मुद्रा के विस्तार पर यह एक बड़ा प्रतिबंध था। 1903 के अधिनियम VI द्वारा 5 रुपये के नोट को बर्मा के सिवाय समस्त ब्रिटिश भारत में सर्वमान्य बना दिया गया अर्थात् वह सभी सर्कलों के लिए वैध मुद्रा बन गया और जारी किए जाने वाले सभी दफतरों से उसकी अदायगी ली जा सकती थी। इसके अतिरिक्त 1905 के अधिनियम III के अंतर्गत कागजी मुद्रा भंडार का निक्षेपी या फिडुशियरी भाग बढ़ा कर 12 करोड़ रुपये कर दिया गया। पहले कदम का उद्देश्य तो नोटों के प्रचलन के व्यवहार को बढ़ावा देना था परंतु दूसरे कदम का उद्देश्य रुपया-मुद्रा का मूल्य कम करना था।
मुद्रा विस्तार की दृष्टि से तीसरी अवधि (1909-14) को अपेक्षाकृत संयत कहा जा सकता है यद्यपि वह भी कोई मंदी का समय नहीं था। इस अवधि के पहले तीन वर्षों को रुपये के सिक्के जारी करने की दृष्टि से दबी हुई भावनाओं का वर्ष कहा जा सकता है। एक अपवाद 1910 का था जब रुपये के नए सिक्कों में कोई शुद्ध
- देखें उल्लिखित पृष्ठ 131-35