विनिमय मानक की स्थिरता 235
और ‘क’ से प्राप्त रुपयों को उसे अपने भंडार से दिए गए सोने के बदले रख देना चाहिए। इससे यह होता है कि उसकी रिजर्व की रचना तो बदल जाती है परन्तु कुल कागजी मुद्रा की मात्रा उतनी ही रहती है। इसलिए यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि जहां तक कागजी मुद्रा रिजर्व में और रोकड़ शेष में स्वर्ण का परिचालन होता है, तो उसका परिणाम मुद्रा के अपसरण में नहीं निकलता। जैसा कि प्रायः कहा जाता है, उन्हें ‘‘रक्षा पंक्तियां’’ बताना इस बात की अनदेखी करना होता है कि ये दोनों मुक्त संसाधन नहीं हैं बल्कि विनियोजित संसाधन हैं।
तब फिर सरकार के रुपया मुद्रा को बंद करने के क्या साधन है? केवल स्वर्ण प्रतिमान रिजर्व। केवल यही एक ऐसा आरक्षित भंडार है जिसकी राशि का किसी विशेष उपयोग के लिए विनियोजन नहीं किया जाता। यह तो मुक्त नकदी होती है और उसी हद तक जहां सरकार के लिए रुपये का स्वर्ण मूल्य घटने की दशा में रुपये की मुद्रा को पुनः स्थापित करना संभव हो। यहां इस बात को ध्यान में रखना महत्त्वपूर्ण है कि इसी सीमा तक मुद्रा को बन्द किया जा सकता है। यह नहीं कि ऐसा होगा ही_ हो सकता है कि ऐसा न हो और ऐसे मामलों की कमी नहीं है जहां ऐसा नहीं हुआ। यहां दो उदाहरण देना पर्याप्त होगा। जब पहली बार 1893-98 में टकसाल बन्द की गई तब यह याद दिलाया जा सकता है कि सरकार के पास किस तरह रुपये भारी संख्या में एकत्र हो गए थे और रुपये का मूल्य बढ़ाने की दृष्टि से यह जरूरी था कि उन्हें बंद करके रख दिया जाए। परन्तु इसकी जगह हुआ यह कि भारत सरकार ने रेलों के विस्तार और अन्य सार्वजनिक कार्यों पर रुपये व्यय करना शुरू कर दिया मानो सरकार द्वारा रुपये क्रय करने का, उससे कोई भिन्न परिणाम होगा जो जनता द्वारा रुपये व्यय किए जाने पर होता। ऐसा ही एक और अनुत्तरदायित्व पूर्ण कार्य था 1920 में रिवर्स कौंसिल्स की बिक्री। इन रिवर्स कौंसिल्स की आवश्यकता पूरी करने के लिए भारत सचिव ने कागजी मुद्रा के रिजर्व में से सोना निकाल लिया। परन्तु जितना सोना निकाला गया था, उसके बराबर नोट रद्द करने की जगह सरकार ने 1920 के अधिनियम XXI के अंतर्गत यह अधिकार प्राप्त कर लिया कि इस अंतर को पूरा करने के लिए तदर्थ सिक्यूरिटीज बना ली जाए, जिससे प्रतिदान तो हुआ परन्तु मुद्रा बन्द नहीं हुई और इतना अधिक सोना व्यर्थ हो गया क्योंकि न तो उसका कीमतों पर प्रभाव पड़ा और न ही विनिमय पर। मार्च, 1920 में पास किया गया यह अधिनियम अस्थायी अवधि के लिए था और इसे अक्तूबर, 1920 में समाप्त होना था। तब तक सरकार मुद्रा बन्द कर सकती थी। परन्तु ऐसा करने की जगह, सरकार ने कागजी मुद्रा कानून में ही 1920 के