6. विनिमय मानक की स्थिरता - Page 259

244 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लिया, जिनका अन्यथा ढाला जाना आवश्यक होगा, तो उसका प्रभाव यह होगा कि स्वर्णमानक रिजर्व की ताकल उस अनुपात में घट जाएगी जितना नए सिक्के ढालने में लाभ होगा। ख्1, कमेटी ने ऐसी नीति की सिफारिश करने की जगह जिससे स्वर्णमान रिजर्व की स्वाभाविक वृद्धि का अंत हो जाएगा, सरकार को इस बात की अनुमति दे दी कि वह रुपये ढाले। परंतु क्या ऐसे रिजर्व में कोई खतरा नहीं? ऐसे रिजर्व का क्या फायदा जिससे ऐसी बुराई पैदा हो जिसको बाद में मिटाने की उससे आशा की जाती है। जो लोग भारतीय गोल्ड स्टैंडर्ड रिजर्व को बढ़ाने का आंदोलन कर रहे हैं, वे वास्तव में इस बात के प्रति सजग नहीं हैं कि ऐसे रिजर्व में क्या खतरे निहित हैं। गोल्ड रिजर्व जितना कम होगा, वास्तव में उतना ही बेहतर होगा क्योंकि तब मुद्रास्फीति नहीं होगी, रुपये की क्रय शक्ति में कोई गिरावट नहीं आएगी, और इसके बंद करने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी।

स्वर्णमानक रिजर्व के मूल को देखते हुए, यह रिजर्व अन्धाधुंध रुपये की मुद्रा जारी करने पर रोक लगाने की जगह उसका सीधा कारण बन जाता है और एक अपरिवर्तनीय मुद्रा के दुष्प्रभावों का विरोध करने की जगह उन्हें बढ़ा देता है। इससे अधिक विकृति नहीं हो सकती। यदि स्वर्ण मानक रिजर्व जैसी प्रक्रिया, जोकि मुद्रा को सीमित रखने के लिए बनाई गई थी, बिना मुद्रा की मात्रा बढ़ाए अपना काम नहीं कर सकती, तब अगर यह प्रणाली मुद्रा को निर्बल नहीं बनाती तो आश्चर्य है कि और कौन बना सकता है। विनिमय मान के समर्थन में बड़े-बड़े नामों का उल्लेख किया जाता है। इस योजना का कोई पूर्व उदाहरण खोजने के लिए बड़ी मेहनत करने के बाद मि. लिंडसे ने फालर कमेटी के सम्मुख दावा किया कि इसे ख्2, आयरिश एक्सचेंज

  1. रिपोर्ट, पैरा 63

  2. 1876 में जब मि. लिंडसे ने ‘कलकत्ता रिव्यू’ के पृष्ठों में इस स्कीम को प्रस्तुत किया, तब उन्होंने इसके

समान और किसी भी चीज की चर्चा नहीं की। सन् 1892 में अपने प्रबंध ‘रिकार्डोज एक्सचेंज रेमेडी’

में उन्होंने अपनी इस स्कीम के बारे में एक प्रामाणिक विद्वान के रूप में रिकार्डो का नाम लिया। परंतु

1898 में उन्होंने अपने इस विचार को बदल लिया_ यहां तक कि उन्होंने प्रोबिन पर आरोप लगाया कि

उसने रिकार्डो की ‘सोने की ईंट’ (गोल्ड बार) योजना को अपना आधार बना लिया है (इकनॉमिक

जर्नल)। रिकार्डो को अपना प्रामाणिक विद्वान मानने से इंकार करने के पीछे शायद मूल कारण यही

था कि मुद्रा के बारे में रिकार्डो के सामान्य विचार, उनके विचारों को हानि पहुंचाने वाले थे। इस बात

को ध्यान में रखते हुए कि उसकी पुस्तक ‘प्रोपोजल्स फॉर इन इकोनॉमिकल एंड सिक्योर करेंसी’ के

शीर्षक को लेकर बहुत से लोग दावे से कहने लगे हैं कि रिकार्डो ने धातु स्टैंडर्ड के विरोध में लिखा।

उसकी इस पुस्तक में से यह उद्धरण उल्लेखनीय हैµ ‘‘बुलियन संबंधी प्रश्नों पर बाद में होने वाली

चर्चा, यह बात लगभग न्यायोचित ठहराते हुए कही गई कि किसी मुद्रा के पूर्ण होने के लिए जरूरी है

कि उसके मूल्य में कतई परिवर्तन नहीं होना चाहिए। परंतु यह भी कहा गया कि बैंक रेस्ट्रिक्शन बिल

के परिणामस्वरूप हमारी मुद्रा ऐसी बन चुकी है क्योंकि इस बिल में हमने बड़ी बुद्धिमत्तापूर्वक इस

....जारी