विनिमय मानक की स्थिरता
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के बारे में बनाई गई संसदीय समिति की रिपोर्ट में देखा गया है। ख्1, इस बात पर मजबूत आधार पर खड़े थे। अन्य बातों के साथ-साथ कमेटी ने यह भी सिफारिश की थी कि इंग्लैंड और आयरलैंड के बीच विनिमय में स्थिरता लाने के लिए बैंक ऑफ आयरलैंड को बैंक ऑफ इंग्लैंड में एक क्रेडिट खाता खोलना चाहिए और लंदन में एक निश्चित कीमत पर ड्राफट बेचने चाहिए। जहां तक लंदन में एक्सचेंज स्टैंडर्ड गोल्ड रिजर्व पर निर्भर करने का संबंध है, यह कहा जा सकता है कि लिंडसे ने पूरी तरह आयरिश कमेटी ऑन एक्सचेंज के प्लान का अनुसरण किया है। परन्तु उसने कमेटी की एक अन्य और अत्यंत आवश्यक सिफारिश को महत्व देने की उपेक्षा कर दी। ख्2, इस सिफारिश में कहा गया था कि ‘‘उपचार के इस तरीके में जिन प्रस्तावित लाभों की चर्चा की गई है वे तब ताकि नहीं मिलेंगे और बहुत ही थोड़ी अवधि के होंगे जब तक कि यह (अर्थात् बैंक ऑफ आयरलैंड) इस बात का वचन न दे कि वह अधिक मात्रा में जारी की गई मुद्रा को कम नहीं कर देगा जिससे आयरलैंड में कागजी मुद्रा के ”ास का उपचार हो सके।’’ वास्तव में जारी की गई मुद्रा को सीमित रखने पर इतना अधिक जोर दिया गया था कि जब पार्नेल ने हाउस ऑफ कॉमन्स में आयरिश मुद्रा में सुधार के संबंध में एक प्रस्ताव रखा, तो उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि कमेटी की सिफारिश को नहीं माना गया। ख्3, थार्नटन ने अपने जवाब में कहा कि आयरिश एक्सचेंज में तब तक स्थिरता नहीं आएगी जब तक कमेटी द्वारा रखी गई शर्त की उपेक्षा की जाएगी। इस विनिमय को खूंटी पर बांधने के अनुभव से इस अत्यावश्यक शर्त के महत्व का पता चलता है। एक्सचेंज को खूंटी पर बांध देना बुनियादी तौर पर एक ऐसा उपाय होता है जिसके द्वारा आंतरिक मूल्य के साथ-साथ मुद्रा के बाहरी मूल्य को भी गिरने से रोका जाए। यहां पर यह देखना
बात को नकार दिया है कि स्वर्ण और चांदी हमारी मुद्रा का स्टैंडर्ड हो। जिन लोगों ने इस विचार का
समर्थन किया, उन्होंने यह नहीं देखा कि परिवर्तनीय होने की जगह, उसमें सबसे अधिक परिवर्तन हो
सकते हैंµ स्टैंडर्ड का एकमात्र उपयोग होता है उसकी मात्रा नियमन करना, और मात्रा के जरिए मुद्रा
के मूल्य का और स्टैंडर्ड के अभाव में इसमें सब प्रकार के फेरबदलों का इस पर प्रभाव पड़ सकेगा
जो फेरबदल मुद्रा जारी करने वालों की अनभिज्ञता या उनके निहित स्वार्थीं के फलस्वरूप हो सकते
हैं।’’
- यह रिपोर्ट एक विद्वतापूर्ण दस्तावेज है, परंतु यह बुलियन रिपोर्ट के कारण ओझल हो गई क्योंकि इसे
1826 तक छापा ही नहीं गया था। तथापि इन दोनों में उसी सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है। देखिए
लार्ड्स पेपर, 1826 का 48 वां।
रिपोर्ट, पृष्ठ 16
देखें हंसार्ड पार्लियामेंटरी डिबेट्स खंड XIV पृष्ठ 75-91