प्राक्कथन- प्रोफेसर ऐडविन केनन - Page 26

प्राक्कथन

प्रोफेसर ऐडविन केनन

मुझे प्रसन्नता है कि श्री अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक के संबंध में कुछ शब्द लिखने का अवसर प्रदान किया है।

वे जानते हैं कि मैं बहुत कुछ उनकी आलोचना से असहमत हूं। 1893 में, मैं उन गिने चुने अर्थशास्त्रियों में था, जिनका विश्वास था कि रुपये को उस समय के प्रस्तावित तरीके से स्वर्ण के साथ नियत अनुपात में रखा जा सकता है। कुछ वर्षों के बाद भी जबकि अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आए हैं, मैं अपने विश्वास से डिगा नहीं हूं। (इकोनोमिक रिव्यू, जुलाई 1898 पृष्ठ 400-403 देखें) मैं इस व्यवस्था के खिलाफ श्री अम्बेडकर के आक्रामक दृष्टिकोण से सहमत नहीं हूं और न ही मैं उनके अधिकांश तर्क-वितर्कों एवं दलीलों को स्वीकार करता हूं। किंतु यह मानते हुए कि वे बिल्कुल गलत हैं और उन्होंने कुछ प्रहार किए हैं, फिर भी मैं यही कहूंगा कि मैंने उनके विचारों और उनके द्वारा दिए गए तर्कों में प्रेरणाप्रद ताजगी का अनुभव किया है। जैसा कि श्री अम्बेडकर बताते हैं कि कुछ अर्थशास्त्री उनके विचारों का विरोध करते हैं, लेकिन मेरे जैसे अनुभवी अध्यापक की मान्यता है कि अम्बेडकर के विचार मौलिक हैं और उन पर गहन चिंतन की आवश्यकता है।

उनके व्यावहारिक निष्कर्षों से मुझे यह सोचना पड़ रहा है कि वह ठीक हैं। साधारण स्वर्ण मानक के स्थान पर स्वर्ण विनिमय प्रणाली के अख्तियार करने पर देश को सिर्फ इतना लाभ होगा कि यह सस्ता है। यह सस्ता इस रूप में है कि स्वर्ण मानक की अपेक्षा धातुमुद्रा के रूप में लागत कम है। सिवाय इसके कि प्रशासकों एवं विधायकों को इसे परिवर्तित करवाना कठिन होगा। इस प्रणाली से जो बचत लाभ होगी वह अत्यल्प होगी। या कहिए कि नहीं के बराबर होगी। हाल ही के दोनों युद्धरत और तटस्थ क्षेत्रों के अनुभव निश्चित रूप से दिखाते हैं कि एक स्वर्ण मानक युद्ध से पूर्व, जैसा कि हम समझते थे, निर्दोष और क्रियाशील नहीं है, निर्दोष और क्रियाशील होने के कारण स्वर्ण विनिमय स्वर्ण-मानक की अपेक्षा अधिक निकट है। जो प्रकाशक और विधायक स्वर्ण मानक को मानते हैं उनकी संख्या कम है। लेकिन स्थिति यह है कि इसके दस से बीस गुनी रहने की संभावना रहेगी जो स्वर्ण विनिमय मानक मानते हैं।

जिस योजना को मानने की श्री अम्बेडकर वकालत करते हैं वह यह है कि रुपये की समस्या को आगे बढ़ने से रोका जाए और टकसालों को स्वर्ण आयातकों और