12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विक्रेताओं के लिए नियत कीमत पर खोल देना चाहिए। इससे कुछ समय में भारत के पास रुपये के नियत स्टॉक के साथ सोने के पिघलने एवं निर्यात करने योग्य सिक्कों की मुद्रा हो जाएगी। इस तथ्य के पीछे यूरोप का इतिहास है। अठारहवीं शताब्दी के इंग्लैंड में स्वर्ण मानक इसलिए अपनाया गया क्योंकि विधायकों ने ऐसा अनुपात रखने की इजाजत दे दी थी जिससे रुपये के सिक्कों का समर्थन न मिल सके। उन्नीसवीं शताब्दी में फ्रांस और दूसरे देशों ने स्वर्ण मानक को अपनाने के लिए चांदी ढालने की टकसालों को बंद कर दिया है, जब कि चांदी के सिक्कों को ढालने के लिए अनुपात लाभप्रद था। चांदी के सिक्कों का और स्वर्ण का कानूनी चलन सिद्धन्ततः कोई नई बात नहीं होगी, यद्यपि कुछ छोटे स्तर पर फ्रांस, जर्मनी और संयुक्त राज्य में ऐसा हुआ।
कभी-कभी यह आरोप लगाया जाता है कि भारत सोने के सिक्के नहीं चाहता मुझे विश्वास नहीं होता कि भारत जैसे देश की परिस्थिति और वातावरण समुचित आकार के सोने के सिक्के सुविधाजनक नहीं होंगे। यह दोषारोपण उस पुराने दोषारोपण जैसा ही है कि अंग्रेज कागजी सिक्कों की अपेक्षा सोने के सिक्कों को पसंद करते हैं। इसका कोई आधार नहीं सिवाय इसके कि कानूनी रूप से 5 पौंड से कम के नोटों को इंग्लैंड और बेल्स में बंद कर दिया गया था जबकि स्कॉटलैंड, आयरलैंड और तकरीबन सभी अंग्रेजी बोलने वाले देशों में 1 पौंड या कम के नोटों के प्रचलन की छूट थी। ऐसा लगता है कि भारत में रुपये का महत्व इस निर्णय पर आधारित है जिसे स्वर्ण मानक प्रणाली के चलने के पूर्व कंपनी ने भारत में शुरू किया। इंग्लैंड में 1816 ई. में टोकन के रूप में चांदी को स्थान दिया गया। कभी यह सोचा गया था और आज भी वही स्थिति बनी हुई है। यह इसलिए नहीं कि भारत सोने को पसंद नहीं करता बल्कि इसलिए कि यूरोपियन इसे इस हद तक पसंद करते हैं कि वे दूसरों को हिस्सेदार बनाना नहीं चाहते।
पूर्वी देशों में सोना जाए इसके लिए विमुखता का कारण सिर्फ नैतिक कारणों से ही अवमान्य नहीं है बल्कि संसार के अधिकांश देशों के आर्थिक हितों के विरूद्ध भी है जिन्होंने युद्ध से पूर्व स्वर्ण मानक को अपनाया था और आज भी उसका प्रचलन है और निकट भविष्य में चलते रहने की संभावना है। सोना उपभोग्य वस्तु नहीं हैं इन देशों के लिए इसका उपयोग वांछनीय है, भले व्यय पर प्रतिबंध के लिए हो या व्यय कम करने के लिए हो। पिछली शताब्दी के अंतिम वर्षों में इसका प्रचुर मात्रा में उत्पादन हुआ है। इसलिए कि उसकी क्रय शक्ति बरकरार रहे और इसकी कीमत स्थायी बनी रहे और इसकी मानक कीमत बरकरार रहे, जब तक यह साबित न हो जाए कि इसके रखने वाले यथेष्ट मात्रा में सोना रखने के इच्छुक हैं और नए स्टाकिस्ट इसे रखने को तैयार हैं। युद्ध से पहले यूरोप में केन्द्रीय बैंकों ने आपूर्ति को रोक दिया और सोने को अधिक तादाद में जमा कर लिया और आपूर्ति पर बंदिश लगा दी। सोने की आपूर्ति न होने से सामान्य उपभोग की वस्तुओं की महंगाई कम हो गई, यद्यपि ऐसा करना बड़ी भूल थी। युद्ध के समय से ही फेडरल रिजर्व बोर्ड जो अमेरिका के लोग सामान्य वस्तुओं को