विनिमय मानक की स्थिरता
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विनिमय को अपनी चिंता स्वयं करने दी जाए। यदि चैम्बरलेन कमीशन ने विनिमय मानक पर इस दृष्टिकोण से विचार किया होता तो उसने इसे एक सुदृढ़ स्टैंडर्ड न कहा होता क्योंकि मूलभूत रूप से यह इसका बिल्कुल उल्टा था।
अब यदि कोई व्यक्ति विनिमय मान की इस निर्बलता से संतुष्ट नहीं होता तो वह यह कह सकता है कि इसकी स्थिरता का आकलन करते समय हमने केवल उन्हीं अवसरों को ध्यान में रखा है जब यह मानक विफल हो गया। इस प्रणाली के प्रति ऐसे बर्ताव को वह अनुचित समझ सकता है और कह सकता है कि उन वर्षों के बारे में क्या कहना है जब स्थिरता बनाए रखी गई थी। क्या उस प्रणाली के पक्ष में कुछ नहीं कहना जिसने 1901 से 1907 तक अथवा फिर 1909 से 1914 तक रुपये के स्वर्ण मूल्य को बनाए रखा। यह प्रश्न प्रासंगिक है और इसके समर्थक लोग यह समझते हैं कि यहां उनकी स्थिति बड़ी मजबूत है और वे विनिमय मानक के विरोधियों से कहते हैं कि या तो वे यह स्वीकार करें कि यह एक स्थिर मानक है या यह दिखाएं कि इस मानक के अंतर्गत रुपया कभी भी अपना स्वर्ण मूल्य बनाए नहीं रख सका। ख्1,
इस स्थिति की मान्यता कुछ ऐसी अवधारणाओं पर आधारित है जो इतनी युक्तिसंगत और सर्वमान्य प्रतीत होती है कि विनिमय मानक के विरुद्ध दिए गए तर्कों का तब तक कोई असर नहीं होगा जब तक कि उनकी व्यर्थता को पूरी तरह दिखा न दिया जाए। पहली अवधारणा यह है कि मुद्रा का मूल्य ”ास तब तक नहीं हो सकता जब तक कि स्वर्ण के रूप में उसका मूल्य ”ास न हो जाए। दूसरे शब्दों में, यदि वृद्धि से मुद्रा के मूल्य में गिरावट किसी एक विशेष वस्तु जैसे स्वर्ण के रूप में परिलक्षित नहीं होती, तब सामान्य तौर पर वस्तुओं के रूप में कोई वृद्धि नहीं हुई है। एक समय था, विशेष कर बुलियन रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान जब सामान्य वस्तुओं के संदर्भ में मुद्रा के मूल्य में परिवर्तन की संकल्पना बहुत से जानकार लोग ख्2, भी अच्छी तरह नहीं समझते थे और उच्च सरकारी अधिकारी भी इसे अमान्य मानते थे। ख्3, जब सूचक अंकों की प्रणाली नहीं थी, तो मूल्य ”ास को किसी वस्तु के रूप में आंकते, जैसे स्वर्ण के रूप में आंकने को क्षम्य समझा जा सकता है। परंतु आज यह बात आधारहीन हो गई
- डॉडवेल, ‘‘ए गोल्ड करेंसी फॉर इंडिया’’ इकोनॉमिक जर्नल 1911, ‘‘रिपोर्ट ऑल द एनक्वायरी इनटु
दि राइज आूफ प्राइसिज इन इंडिया’’ 1914, पृष्ठ 94
- बुनियन पर हुई बहस के दौरान यदि केनिंग के लार्ड कैसलरीध की स्टैंडर्ड की परिभाषा को यदि मूल्य
की अनुभूति बताया, तो इसे उनकी अनभिज्ञता ही समझना चाहिए।
- रिकार्डो ने अपने ‘‘प्रोपोजल्स फार एन इकोनॉमिक्स एंड सिक्यूर करेंसी’’ में लिखाµ ‘‘यह वास्तव में
कहा गया है कि किसी मुद्रा के मूल्य का निर्णय किसी एक वस्तु के संदर्भ में नहीं बल्कि बहुत सी
वस्तुओं के संदर्भ में किया जाना चाहिए.......परंतु इस कसौटी का कोई भी उपयोग नहीं होगा........ इस
प्रस्तावित कटौती से मुद्रा के मूल्य का पता लगाना ........ स्पष्टतः असंभव है।’’