248 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है। अब किसी को यह दिखाने की जरूरत नहीं कि हर वस्तु की कीमत में उतना ही फेरबदल हुआ है और उसी दिशा में हुआ है जैसा कि वस्तुओं के सामान्य मूल्य स्तर में हुआ है। केवल स्वर्ण जैसी एक ही वस्तु को मूल्य ”ास का पैमाना क्यों बनाया जाए? यदि स्वर्ण का मूल्य ”ास अन्य सभी वस्तुओं के रूप में मुद्रा के मूल्य ”ास का सही पैमाना है तो इसकी अनुमति दी जा सकती है यद्यपि यह अदूरदर्शितापूर्ण है। परंतु बात ऐसी है नहीं। गृह युद्ध के दिनों में संयुक्त राज्य अमरीका के ग्रीनबैक्स के अनुभव की चर्चा करते हुए प्रो. डब्ल्यू सी. मिशल ने कहा ख्1, µ
‘‘स्वर्ण के मूल्य में घट-बढ़ को जिसने लोगों का इतना ज्यादा ध्यान आकृष्ट किया, अन्य वस्तुओं के मूल्यों में आई भारी घट-बढ़ के मुकाबले सीमित ही कहा जाएगा। स्वर्ण की कीमतें अन्य वस्तुओं की कीमतों में आई घट-बढ़ के क्षेत्र के काफी भीतर ही रहती हैं........ युद्ध काल में स्वर्ण की कीमतों में अन्य वस्तुओं की कीमतों के मुकाबले अधिक घट-बढ़ हुई....... जब स्वर्ण की कीमतें बढ़ रही थीं तो अन्य अधिकांश वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ीं परंतु स्वर्ण के मुकाबले अपेक्षाकृत कम तेजी से........ जब स्वर्ण की कीमतें गिर रही थीं, तब अधिकांश वस्तुओं की कीमत स्थिर रहीं या धीमी गति से गिरी। युद्ध के बाद वस्तुओं के मूल्य गिरने की दर में कमी आना और भी अधिक स्पष्ट लगने लगा। यद्यपि कीमतों में गिरावट तेजी से आई परंतु यह गिरावट स्वर्ण में आई गिरावट जितनी तेज नहीं थी। एक और रोचक बात यह है कि दस वर्ष तक वस्तुओं का कीमत स्तर स्वर्ण के मुकाबले अधिक बना रहा।’’
इससे पता चलता है कि विनिमय मानक के पक्षधर लोगों ने जो कसौटी अपनाई है, वह गलत है और उससे मुद्रा के मूल्य के बारे में गलत सूचना मिलती है। इस बारे में कोई संदेह नहीं कि जिन लोगों ने इस कसौटी की इस मानक पर लागू करने की बात की है, यदि वह इस बात ख्2, को अच्छी तरह ध्यान में रखते कि स्वर्ण के रूप में किसी मुद्रा के विशिष्ट मूल्य ”ास और वस्तुओं के रूप में आए सामान्य मूल्य ”ास में अंतर होता है तो शायद वह इस बात पर इतना जोर न देते जितना कि अभी उन्होंने दिया था। आस्थगित अवधि में बैंक ऑफ इंग्लैंड का अनुभव इस सिद्धांत का सबसे बड़ा उदाहरण है जहां मुद्रा का तो आमतौर पर मूल्य ”ास हुआ यद्यपि विशिष्ट मूल्य ”ास के दर्शन नहीं हुए।
‘गोल्ड प्राइसिज एंड वेजिज अंडर ग्रीनबैक स्टैंडर्ड, 1908 पृष्ठ 39-41
तुलना करेंµप्रो. निकलसन कृत ‘प्रिंसिपल्स ऑफ पॅालिटिकल इकोनॉमी (1893), खंड II अध्याय
XV 4 और वाकर एफ.ए. कृत ‘मनी’, 1878 पृष्ठ 387-91