विनिमय मानक की स्थिरता
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मांग अनुभव की जाती है और यहीं पर विशिष्ट मूल्य ”ास का पहले-पहल पता चलता है। परंतु यहां पर भी यह जरूरी नहीं होता क्योंकि हर चीज इस बात पर निर्भर करती है कि क्या विदेशी अन्य वस्तुओं को भी स्वर्ण की तरह स्वीकार कर लेगा या नहीं और क्या वे उपलब्ध हैं या नहीं। अब भारत में ये तीनों कारक लगभग काम कर रहे हैं जिनसे विशिष्ट मूल्य ”ास स्थगन किया जा सकता है। रुपया एक पूर्ण वैध मुद्रा है और स्वर्ण का सहारा लेने से मजबूर हुए बिना इससे ऋणों का निपटान किया जा सकता है। भारत जैसे गरीब देश ख्1, में उद्योगों के लिए स्वर्ण की मांग बहुत अधिक कभी नहीं हो सकती। फलतः सामान्य रूप में रुपये का जो मूल्य ”ास हुआ है, उसका देश के आंतरिक व्यापार या मूल्य ”ास के रूप में तत्काल
- विभिन्न देशों में स्वर्ण की खपत के बारे में निम्नलिखित तालिका बहुत रोचक हैःµ
स्वर्ण की खपत (मिलियनस् पौंड स्टर्लिंग, 85 शिलिंग प्रति फाइन औंस की दर से)ऽ
1915 1916 1917 1918 1919 1920
औद्योगिक कलाएं 17.0 18.0 16.0 17.0 22.0 22.0 (यूरोप और अमेरिका)
भारत (3 वर्ष से अगले 1.4 5.1 19.6 -3.3 27.7 5.1 वर्ष 31 मार्च तक)
चीन -1.7 2.6 2.6 0.04 11.5 -3.7 मिश्र -0.8 -0.2 -0.1 -0.0 -0.0 ? मुद्रा के रूप में रोकड़ शेष (अंतर) 80.5 68.0 48.2 64.9 13.8 46.6 विश्व 96.4 93.5 86.3 79.0 75.0 70.0
ऽ ये आंकड़े मि. जोसेफ किचिन ने ‘दि रिव्यू ऑफ इकोनॉमिक स्टैटिसटिक्स, के प्रारंभिक खंड 3, सं. 8
में अगस्त, 1921 के लिए पृष्ठ 257 पर दिए है। (यदि 1914 से पहले के आंकड़े चाहिए तो उक्त
पुस्तक में पृष्ठ 258 पर सारणी देखिए।
यदि 1917 ओर 1919 के असामान्य वर्षों को निकाल दिया जाए और आंकड़ों को प्रति व्यक्ति के
हिसाब से लिया जाए तो भारत में सोने की खपत बहुत ही मामूली बैठेगी। इसके अतिरिक्त यह भी
ध्यान में रखना चाहिए कि भारत में स्वर्ण की खपत औद्योगिक और मुद्रा, दोनों कामों के लिए है। इसके
अतिरिक्त तुलना करते समय यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि अवधि की इकाई भारत और अन्य
देशों के लिए अलग-अलग है। यह ठीक है कि इन दिनों जब सामान्य वस्तुओं के रूप में स्वर्ण का
बहुत अधिक मूल्य ह्रास हो चुका है, तब यदि इसका उत्पादन घटना है तो उसके लिए आंसू बहाने की
कोई जरूरत नहीं, और यदि इसका उपयोग बढ़ता है तो वह भी कोई स्वागत योग्य बात नहीं। इसलिए
यदि भारत में सोने का आयात और उपयोग बढ़ता है तो इस वृद्धि का विरोध करना बुद्धिमतापूर्ण नहीं
होगा। इसलिए आज जैसी परिस्थिति है, उसमें दुनिया के लिए यही बेहतर होगा कि स्वर्ण का उपयोग
बढ़े और उत्पादन कम हो। इस संबंध में तुलना करें जे.आर.एस.एस. के जुलाई 1920 के अंक के पृष्ठ
623-24 पर मि. शिराज के लेख पर प्रो. केनन की टिप्पणी से।