252 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कोई प्रस्ताव नहीं पड़ता। जहां तक विदेशी भुगतान का सवाल है, भारत की स्थिति यहां भी उतनी ही मजबूत है_ पर इस कारण नहीं जैसा कि मूर्खतावश माना जाता है कि उसका व्यापार संतुलन अनुकूल है अपितु इसका कारण यह है कि भारत के पास कई ऐसी बहुत जरूरी वस्तुएं हैं_ जो किसी विदेशी को स्वर्ण की जगह लेनी ही पड़ती हैं। ख्1, भारत में रुपये का विशिष्ट मूल्य ”ास तभी होगा जब सामान्य मूल्य ”ास के अंतर्गत वे वस्तुएं आ जाएंगी जो भारत के विदेश व्यापार का भाग हैं। परंतु यह अपरिहार्य है कि मूल्य ”ास का प्रभाव उन वस्तुओं पर भी पड़ेगा जैसा कि नीचे ठीक ही कहा गया है ख्2, ःµ
‘‘किसी आधुनिक समुदाय में विभिन्न वस्तुओं की कीमतें एक पूर्ण संगठित प्रणाली का भाग होती हैं जिसके भिन्न-भिन्न भाग एक जटिल व्यापारिक प्रक्रिया के अनुसार एक-दूसरे से समायोजित होते रहते हैं। महत्वपूर्ण वस्तुओं की कीमतों में कोई विशेष परिवर्तन आने से इस प्रणाली का संतुलन गड़बड़ा जाता है और व्यापारिक प्रक्रियाएं तुरंत शुरू हो जाती हैं, जिनके अंतर्गत अन्य वस्तुओं की कीमतों के साथ समायोजन की शृंखलाएं शुरू हो जाती हैं ताकि वह पुनर्स्थापित हो सके।’’
यह सच है कि भारत में आंतरिक व्यापार के लिए उत्पादन और विदेशी व्यापार के लिए उत्पादन के बीच वैसा घनिष्ठ संबंध नहीं है जैसा कि अन्य देशों में होता है। इस स्थिति में इससे यही अंतर आ सकता है कि सामान्य मूल्य ह्रस की गति नरम पड़ जाए ताकि विदेशी व्यापार की वस्तुओं पर इसका बहुत जल्दी असर न पड़े। परंतु यह इसके प्रभाव को अंततः कीमतें बढ़ने से रोक नहीं सकती_ और एक बार जब कीमत बढ़ जाएगी तो चाहे वह वस्तु कितनी भी जरूरी हो, विदेशी उसे स्वीकार नहीं करेगा। स्वर्ण की मांग जरूर बढ़नी चाहिए जिससे मुद्रा का विशिष्ट मूल्य ”ास होगा। यह वक्तव्य बैंक ऑफ इंग्लैंड तथा भारत की अनुमति से भी बहुत समीप से मेल खाता है। बैंक ऑफ इंग्लैंड के मामले में यह ‘‘बड़ी बुराई’’ अर्थात् बैंक नोटों का विशिष्ट मूल्य ”ास 1809 में सामने आया, निलम्बन घोषित होने के पूरे 13 वर्षों बाद। इसी के बारे में हार्नर को बड़ी शिकायत थी। इसी तरह हम देखते हैं कि भारत के मामले में भी मूल्य ”ास विभिन्न अंतराल के बाद आया जिसने यह दिखा दिया कि विशिष्ट मूल्य ”ास को दूर रखने के लिए भी यह जरूरी है कि मुद्रा के सामान्य मूल्य ”ास पर ध्यान दिया जाए।
प्रो. मार्शल का साक्ष्य आई.सी.सी. 1898 पृष्ठ 11, 793
मिशेल, उल्लिखित, पृष्ठ 258