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स्वर्ण मानक की ओर वापसी

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कीमतों के दृष्टिकोण से विनिमय मान पर विचार करते समय, यह बात ध्यान में रखनी होगी कि भारतीय टकसालों को मुक्त रूप से चांदी के सिक्के डालने के लिए बंद करने का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि रुपये का मूल्य ”ास हो रहा था जिसका नतीजा कीमतें ख्1, बढ़ने में निकल रहा था। इसलिए टकसालों को बन्द करने का नतीजा यह निकलना चाहिए था कि भारत में कीमतें गिर जातीं_ क्योंकि प्रो. फिशर ख्2, की भाषा में कहा जाए तोµधन मुद्रा का जलाशय और मूल्यवान धातु का जलाशय जिस पाइप से जुड़े हुए हैं_ टकसाल बन्द होने के कारण यह पाइप बन्द हो गया था यहा उसने काम करना बन्द कर दिया था। इस तरह मूल्यावान धातुओं में से चांदी धातु का मुद्रा के जलाशय में जाना रुक गया था। ख्3, दूसरे शब्दों में खानों से नई निकाली गई चांदी टकसालें बन्द होने के काण मुद्रा नहीं बन सकती थी और प्रचलन में पड़े रुपये की क्रय शक्ति नहीं घटा सकती थी। यदि ऐसी बात है तो टकसाल बन्द करने का प्रभाव कितना निराशाजनक पड़ा? कीमतों की दृष्टि से रुपया एक ऐसी समस्या बन गया था जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। टकसाल बन्द करने के बाद से भारत के इतिहास में कीमतों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई (देखिए अध्या-6) वास्तव में टकसाल बन्द करने से पहले जब चांदी व मूल्यवान धातु के जलाशय को जोड़ने वाला पाइप साबुत था तो कीमतों में जो वृद्धि हुई थी, वह टकसाल बन्द होने के बाद पाइप काट देने के बाद कीमतों में आई वृद्धि के मुकाबले नगण्य थी। इसलिए कीमतों की दृष्टि से टकसाल बन्द करना वरदान की जगह अभिशाप अधिक सिद्ध हुआ है और सही बात यह है कि निरन्तर बढ़ती हुई कीमतों के कारण भारत में जीना असहनीय होता जा रहा है। कहीं भी जनता की कीमतें बढ़ने से उतनी मुसीबतों का सामना नहीं करना पड़ रहा जितना भारत के लोगों को। युद्ध काल में कीमतें इतनी ऊंची पहुंच गईं जहां पर सिर चकराने लगता है। भोजन और कपड़ा न खरीद पाने के कारण आत्महत्या करने वाले स्त्री-पुरुषों की खबरें काफी अधिक थीं। तथापि यह तर्क दिया जा सकता है कि यदि टकसालें बंद न की जातीं तो कीमतों में और भी अधिक वृद्धि होती और भारत केवल चांदी के मान वाला देश बना रहता। निस्संदेह इस राय के पक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता है। बात बिल्कुल सच है क्योंकि चांदी को सभी जगह हटाया जा रहा है, इसलिए यह मूल्य के मान के रूप में काम नहीं कर सकती। इस हद तक शुद्ध चांदी के मान के मुकाबले विनिमय मान बेहतर है। किन्तु क्या यह गोल्ड स्टैंडर्ड जितना अच्छा है?

  1. देखिए उल्लिखित, अध्याय- III

  2. परचेजिंग पावर ऑफ मनी, 1911, पृष्ठ 128