262 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वस्तुओं के बारे में दोनों मुद्राओं की क्रय शक्ति समता नहीं होती। इन सबका तात्पर्य यही होता है कि जो वस्तुएं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में शामिल होती हैं उनके लिए रुपये की क्रय शक्ति स्वर्ण के सम मूल्य पर रखी जाती है। इससे स्वर्ण के रिजर्व के खत्म होने की आवश्यकता अक्सर नहीं आती। स्वर्ण रिजर्व के संरक्षित रखने का तात्पर्य केवल इतना होता है कि जहां तक अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की वस्तुओं की कीमतों का सवाल है, उनमें समानता रहती है। इस तरह व्याख्या करने से यह तथ्य कि रुपये का स्वर्ण मूल्य बनाए रखा जाता है, उसमें इस सम्भावना की गुंजाइश रहती है कि कुल मिलाकर भारतीय कीमतें स्वर्ण की कीमतों से अधिक हों जिससे इस पूर्ववर्ती धारणा का खंडन हो जाता है कि विनिमय मान स्वर्ण मान जितना ही अच्छा होता है।
इस बात को बता दिया जाना चाहिए ख्1, कि कीमतों में होने वाले सभी परिवर्तनों का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर लगभग पड़ता है। तथापि वर्तमान आर्थिक संगठन में जो लचीलापन है जिसमें पूंजी और श्रम एक जगह से दूसरी जगह जाता है, मुक्त प्रतियोगिता है, चुनने की छूट है, आविष्कार करने का प्रतिमान है और बौद्धिक क्षमता का उपयोग व व्यापारी की जो कीमतों का आम व अस्थाई करते हैं परिवर्तनों की देख-रेख कर लेता है। परन्तु जब कीमतों का स्तर सामान्य तौर पर और निरंतर ही एक दिशा में बढ़ता जाता है, तब स्थिति बदल जाती है। तब इस आशा को लेकर व्यवस्था करना कि कीमतों का उतार-चढ़ाव केवल अस्थायी तौर पर है और यह फिर लौट कर पिछले साधारण स्तर पर आ जाएगी। अक्सर असफल हो जाती है। फेरबदल की आशा में अपने पास रखे रहने से जो कष्ट सहना पड़ता है उसकी पूर्ति दूसरी दिशा में होने वाले लाभ से नहीं की जा सकती। संक्षेप में, इस तरह एक ही दिशा में कीमतों के चलने से सामान्य व्यापारिक बुद्धि भ्रमित हो ही जाती है और इससे भविष्य की सारी गणना गड़बड़ा जाती है जिसका परिणाम यह निकलता है कि असीमित रूप में घाटा उठाना पड़ता है और व्यक्ति को इतना जोरदार और उसी के साथ अगणनीय झटका लगता है कि आर्थिक दृष्टि से उसके अपने आर्थिक जीवन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं रह पाता। और अपने अस्तित्व के लिए अपनी बुद्धिमत्ता, दूरदशि्र्ाता और शक्ति का उपयोग करके भी वह कुछ नहीं कर पाता। किसी भी मौद्रिक मान में मूल्यों की पूर्ण स्थिरता केवल एक आदर्श की अवस्था होती है। परन्तु अस्थिरता के दुष्परिणाम इतने खराब होते हैं, कि प्रो. मार्शल को भी, जो यह विश्वास करते थे कि
- आगे की पंक्तियों में जो कुछ लिखा गया है, वह पॉलिटिकल साइंस क्वार्टर्ली, खण्ड- XV सं. 1 (मार्च,
1900) पृष्ठ 14-17 में दो स्मिथ के लेख ‘प्राइस मूवमेंट्स एंड इंडिविजुअल वेल्फेयर’ का संक्षेप है