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स्वर्ण मानक की ओर वापसी

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आर्थिक जीवन पर प्रभाव डालने वाले मौद्रिक आधार के हस्तक्षेप करने के विरोध में जो सामान्य पूर्वाग्रह है, वह सचमुच उचित पूर्वाग्रह है, यह कहना पड़ा कि ‘‘इस फेरबदल में कमी लाकर समुदायों के आर्थिक कल्याण की रक्षा के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। ख्1, मूल्य ”ासित होने वाला मानक एक बुराई होता है जैसे स्वर्ण का 1896 से हो रहा है। परन्तु यदि किसी मूल्य के मान का सदैव मूल्य ”ास होता रहे जैसा कि विनिमय मान के मामलों में हुआ है, और वह भी स्वर्णमान के मुकाबले में अधिक तेजी से हो, अथवा दूसरे शब्दों में कीमतों में अधिक तेजी से वृद्धि आए, तब क्या उसे मूल्य का बढि़या मान समझा जा सकता है?

जब इस बात को दृष्टि में रखते हैं तो यह बात विचित्र लगती है कि प्रो. केन्स ने अपने शोध प्रबंध ‘इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस’ में यह कहा कि विनिमय मान में भविष्य के आदर्श मान ख्2, के सभी गुण विद्यमान हैं इसी विचार का बाद में चैम्बरलेन कमीशन ने भी अनुमोदन किया। यदि क्रय शक्ति की स्थिरता को सामान्यतया वस्तुओं के रूप में मापने को किसी मुद्रा प्रणाली की कसौटी माना जाए तो अर्थशास्त्र के थोड़े से विद्यार्थी ही प्रो. केन्स से सहमत होंगे। शायद इसे आशावादिता ही कहा जाएगा कि 1920 के प्रो. केन्स स्वर्ण विनिमय मान की जगह स्वर्णमान को प्राथमिकता देंगे क्योंकि पहले मान से दूसरे मान की अपेक्षा कीमतों में बहुत कम उतार-चढ़ाव होगा।

इस संदर्भ में भारत में विद्यमान इस गलत धारणा की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है कि भारत एक स्वर्ण मान का देश है। यह तो सभी स्वीकार करेंगे कि किन्हीं दो देशों में मूल्य का वही मान है, इसकी व्यावहारिक कसौटी इन देशों की कीमतों के स्तर में उतार-चढ़ाव की विशेषताएं होगी। यह कसौटी इतनी निश्चित है कि ग्रीन बैक अवधि के लिए विभिन्न देशों के और अमेरिका की कीमतों के स्तर का बड़ी सावधानीपूर्वक और बुद्धिमत्तापूर्वक सर्वेक्षण करने के बाद प्रो. मिशल की निम्नलिखित टिप्पणी थी। ख्3,

‘‘जब दो देशों में एक-सी मौद्रिक प्रणाली हो और उनके आपस में महत्त्वपूर्ण व्यापारिक संबंध हों तो उनकी कीमतों के स्तर में होने वाले उतार-चढ़ाव जो वहां के सूचक अंकों से ज्ञात होते हैं, आपस में बहुत अधिक मिलते हैं। ये आपस में इतना अधिक मिलते हैं कि फेरबदल की यह सादृश्यता उस समय भी इतनी अधिक नजर आती है जब यह सूचक अंक अलग-अलग प्रकार की वस्तुओं को लेकर अलग-अलग वर्षों के लिए बनाए जाते हैं।’’

  1. तुलना करेंµ ‘दि कन्टैम्परेरी रिव्यू’ के मार्च, 1887 अंक में प्रकाशित लेख ‘रेमेडीज फॉर फलक्चुएशंस

ऑफ जनरल प्राइसिज

  1. तुलना करेंµ उल्लिखित का पृष्ठ 36

  2. गोल्ड, प्राइसिस एंड वेजिज अंडर दि ग्रीन बैक स्टैंडर्ड’ 1908, पृष्ठ 27