264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अब हम यह जानते हैं कि युद्ध से पहले इंग्लैंड एक स्वर्ण मान का देश था_ और हम यह भी जानते हैं कि भारत और इंग्लैंड में समकालीन कीमतों के उतार-चढ़ाव में कोई घनिष्ठ समानता नहीं थी। इस दृष्टि से यह कहना केवल भ्रामक होगा कि भारत स्वर्णमान का देश रहा है। दूसरी ओर यह स्वीकार करना अधिक अच्छा है कि भारत को अभी तो स्वर्णमान वाला देश बनना है जब तक कि हम वह गलती न करें जो प्रो. फिशर ने की थी ख्1, जब उन्होंने भारत में असाधारण रूप से बढ़ती हुई कीमतों का कारण भारत में स्वर्णमान की उपस्थिति को बताया था जबकि असलियत यह थी कि भारत में कीमतें स्वर्णमान के न होने की वजह से बढ़ी थीं।
वह स्वर्णमान वाला देश कैसे हो सकता है? इसका स्पष्ट-जारी साफ उत्तर है स्वर्ण मुद्रा करके। प्रो. केन्स इस विचार की हंसी उड़ाते हैं कि बिना स्वर्ण मुद्रा के स्वर्ण स्टैंडर्ड रखने की बात महज एक मूर्खता है। ख्2, उनका यह विचार लगता है कि एक मुद्रा और मूल्य का मान दो अलग-अलग चीजें हैं। यहां वह निश्चित रूप से गलती पर हैं। क्योंकि समाज को आवश्यकता होती है विनिमय के माध्यम की, मूल्य के मान की और मूल्य के संचय की ताकि उसकी आर्थिक जीवन चलता रहे। ऐसा तर्क देना पक्के तौर पर गलत है कि ये तीनों काम अलग-अलग साधनों द्वारा किए जा सकते हैं। इसके मुकाबले जैसा कि प्रो. डावेन पोर्ट जोर देकर कहते हैं, ख्3,
‘‘मुद्रा के विभिन्न उपयोग के बीच की प्रक्रिया के केवल विभिन्न पक्षों का जोर
बढ़ाकर प्रकट करते हैं। आस्थगित भुगतान विभिन्न पहलुओं पर जोर देते हैं।
केवल बीच का आस्थगित भुगतान है। यही बात मान के पहलू की है। जो कुछ
भी सामान्य बीच का होता है, वही असल में मान होता है। काम दो नहीं है,
अपितु एक है.... स्पष्टतः बीच की क्रयशक्ति का भंडार भी हो सकता है। वस्तु
विनिमय के दूसरे आधे भाग को स्थगित रखा जा सकता है। बीच का सामान्य
क्रय शक्ति है। बीच के कार्य की एक विशेष सुविधा यह है कि देर तक रोका
जा सकता है।’’
इस तरह, चूंकि रुपया मुद्रा है, वह मूल्य का मान भी है। यदि हम चाहते हैं कि भारत में स्वर्ण मूल्य का मान बने तो उसे भारत की मुद्रा में भी शामिल करना पड़ेगा। परन्तु यह पूछा जा सकता है कि यदि स्वर्ण को भारतीय मुद्रा का एक भाग बना दिया
‘परचेजिंग पावर’ आदि, 1917, पृष्ठ 340
उल्लिखित का पृष्ठ 29
उल्लिखित का पृष्ठ 253-56ः तुलना करें- एफ.ए. बाबर कृत ‘मनी इन इट्स रिलेशन टु ट्रेड’, पृष्ठ 27
और सी.एम. वाल्श कृत ‘दी फण्डामेंटल प्रॉब्लम इन मॉनेटरी साइंसिज’ पृष्ठ 304