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स्वर्ण मानक की ओर वापसी

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जाए तो उससे भारत में कीमतों के स्तर में क्या परिवर्तन आएगा? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए जरूरी है कि पहले रुपया मुद्रा की प्रकृति का असली स्वरूप प्रस्तुत किया जाए। अब यहां यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि मूल्य के जिस मान का विस्तार या संकुचन किया जा सकता है, वह ऐसे मान की अपेक्षा अधिक स्थिर होगा जिसका संकुचन या विस्तार नहीं किया जा सकता। रुपया ख्1, मुद्रा में आसानी से विस्तार होने की क्षमता है परन्तु इसमें आसानी से संकुचन की क्षमता नहीं है क्योंकि न तो इसका निर्यात किया जा सकता है और न ही इसे पिघलाया जा सकता है और न ही इच्छा होते ही इसे परिवर्तित किया जा सकता है। माननीय श्री गोखले ने अपने एक भाषण में ऐसी मुद्रा की तुलना निर्यात योग्य मुद्रा से बड़े अच्छे ढंग से इस तरह की थी ख्2, ःµ

‘‘अब एक स्वचालित स्वतः समायोजित होने वाली मुद्रा, जैसा कि स्वर्ण के साथ

हो सकता है अथवा जैसे 1893 से पहले हमारे यहां चांदी की मुद्रा थी और अब

हमारे यहां जैसी कृत्रिम मुद्रा है, तो इन दोनों में अंतर क्या है। अब भारत की जैसी

भौगोलिक स्थिति है, व्यापार की मांग पूरी करने के लिए हमें निर्यात के मौसम

के छः महीनों में सदैव स्वर्ण या चांदी के सिक्कों की एक निश्चित संख्या में

आवश्यकता पड़ेगी। जब निर्यात का मौसम तेजी पर होगा तो वस्तुएं खरीदने के

लिए धन हमें देश के अन्दरूनी भागों में भेजना पड़ेगा। यह बात दोनों स्थितियों

में लागू रहती हैµचाहे आज जैसी कृत्रिम मुद्रा हो अथवा 1893 से पहले की

चांदी की मुद्रा हो। परन्तु अंतर इस बात में है कि मंदी के मौसम के बाकी छः

महीनों में हमारे पास मुद्रा की बहुतायत हो जाती है और स्वतः समायोजित हो

जाने वाली स्वचालित मुद्रा की बहुतायत हो जाने पर उसके लिए तीन रास्ते खुले

होते हैंµअतिरिक्त सिक्के या तो बैंकों में चले जाते हैं या सरकार के खजाने में

वापस आ जाते हैं, अथवा उनका निर्यात कर दिया जाता है, अथवा लोग अपनी

जरूरत के कार्यों के लिए उन्हें पिघला देते हैं। परन्तु जहां स्वतः समायोजित

होने वाली स्वचालित मुद्रा नहीं होती, जहां सिक्का केवल एक कृत्रिम प्रतीक

मुद्रा होता है जैसा कि आजकल हमारा रुपया है, इन तीन रास्तों में से दो रास्ते

उसके लिए बंद हो जाते हैं। आप बिना भारी हानि उठाए रुपये का निर्यात नहीं

कर सकते। आप बिना भारी हानि उठाए रुपये को पिघला नहीं सकते, फलतः

फालतू सिक्के बैंकों में या सरकारी खजाने में पहुंचने चाहिए अथवा लोग उनकी

खपत को बाद वाले मामले में उसकी स्थिति जलरुद्ध जमीन जैसी जो जाएगी,

जहां निकासी की कोई कुशल व्यवस्था नहीं है और जिससे आर्द्रता को नहीं

  1. प्रांतीय दित्तव्यवस्था के विकास शीर्षक वाले अध्याय में से कोष्ठक वाला भाग नहीं हैµसम्पादक।
  2. सुप्रीम लेजिस्लेटिव कौंसिल का कार्यवृत्त, खण्ड 50, पृष्ठ 642