7. स्वर्ण मानक की ओर वापसी - Page 283

268 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इसके सिवाय और कुछ नहीं कि दूसरे प्रकार की मुद्रा जरूरत से ज्यादा जारी कर दी गई। सन नब्बे के दशक में जब भारत में स्वर्णमान स्थापित करने पर विचार किया जा रहा था तो कुछ लोग इटली और आस्ट्रियाई साम्राज्य द्वारा स्वर्ण के प्रचलन को प्रोत्साहन देने के व्यर्थ के प्रयासों की चर्चा करते थे। यह एक तथ्य है कि उनका स्वर्ण अन्तर्धान हो जाता था पर ऐसा उनकी गरीबी के कारण नहीं होता था। यह तो उनकी कागजी मुद्रा के कारण होता था। कोई भी देश स्वर्ण मुद्रा चला सकता है बशर्तें कि उसी के साथ वह एक और सस्ती मुद्रा न चला दे।

और फिर यदि सौदे छोटे होने के कारण स्वर्ण के सिक्के प्रचलन में नहीं आएंगे, तो इसका यह मतलब नहीं कि स्वर्ण के सिक्के प्रचलन से निकाल लिए जाएं, बल्कि यह है कि स्थिति का सामना करने के लिए मुद्रा की इकाई छोटी रखी जाए। प्रचलन की कठिनाइयों से सिक्कों की ढलाई की समस्या उठ खड़ी होती है। परन्तु सिक्कों की ढलाई की समस्या को इस प्रश्न के निर्णय का आधार नहीं होने दिया जा सकता कि मूल्य का मान क्या हो। यदि सावरेन प्रचलन में नहीं चलता तो इसका अर्थ यह नहीं कि भारत स्वर्ण मुद्रा न रखे। इसका अर्थ यही है कि प्रचलन की दृष्टि से सावरेन बहुत बड़ी मुद्रा है। यहां मामला यदि कोई है भी तो वह सॉवरेन सिक्के की इकाई के विरूद्ध दिया जा रहा है न कि स्वर्ण मुद्रा के सिद्धांत के विरूद्ध। यदि सावरेन इतना छोटा नहीं है कि प्रचलन में आ सके तो निष्कर्ष यह निकलता है कि स्वर्ण के प्रचलन को प्रभावकारी बनाने के लिए हम कोई और छोटा सिक्का बनाएं।

स्वर्ण मुद्रा के विरूद्ध चौथा तर्क तो एक तथ्य के रूप में है जिसे न सत्य सिद्ध किया जा सकता है और न ही असत्य। इसके लिए तो प्रमाण देखने पड़ेंगे कि क्या स्वर्ण मुद्रा में वह प्रवृत्ति होती है जो उसकी बताई जाती है। परन्तु क्या हम यह पूछ सकते हैं कि क्या मुद्रा की उस प्रणाली में कोई जोखिम नहीं होता जिसमें कागजी मुद्रा रुपयों में परिवर्तनीय होती है? क्या कागज का रुपये के मूल्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा? यदि कमीशन ने इस प्रश्न पर विचार किया भी है जो बहुत सन्देहास्पद है, तो शायद उसे इस आम राय को मानने के लिए प्रेरित किया गया था कि कागजी मुद्रा परिवर्तनीय होती है इसलिए वह रुपये के मूल्य या उसकी क्रय शक्ति पर कोई प्रभाव नहीं डालती। यह राय बनाना गलत था क्योंकि कागजी मुद्रा के जितने भाग को सुरक्षा राशि के अन्दर किया गया, उस हद तक उसकी परिवर्तनीयता उसे लेखे की इकाई के मूल्य को गिरने से नहीं रोक सकती जिसमें वह परिवर्तनीय है क्योंकि प्रतियोगिता के कारण लेखे की उस इकाई की मांग कम हो जाती है जिससे उसके मूल्य में गिरावट आती है। इस तरह यद्यपि कागजी मुद्रा के रूप में कम खर्चीला बैठता है, वह रुपये के मूल्य के लिए खतरा होता है। यदि रुपया स्वर्ण में मुक्त