7. स्वर्ण मानक की ओर वापसी - Page 285

270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

से घुसता है, परन्तु उसके बाहर निकलने का कोई निकास द्वार नहीं है। दूसरी ओर स्वर्ण इस जलाशय में एक नल के जरिए प्रवेश करता है, जहां से वह अन्दर प्रवेश भी कर सकता है और बाहर निकल भी सकता है। तब भला फिर स्वर्ण भारत के जलाशय में प्रवेश क्यों नहीं करता? इस प्रश्न को ठीक तरह समझ कर ही हम 1898 में प्रस्तावित सुदृढ़ प्रणाली की ओर लौट सकते हैं।

प्रश्न के इस पहलू से संबंधित साहित्य का अध्ययन करने से पता चलता है कि भारत की मुद्रा प्रणाली में स्वर्ण के प्रवेश न करने की दो व्याख्याएं दी जाती हैं। एक तो है भारत सचिव द्वारा कौंसिल बिलों की बिक्रीµ कहा जाता है कि कौंसिल बिलों की बिक्री का प्रभाव यह होता है कि स्वर्ण के भारत में आने पर रोक लग जाती है। मि. सूबेदार को भारतीय मुद्रा का एक अधिकारी विद्वान माना जाता है। उन्होंने स्मिथ कमेटी के सामने (प्र. 3,502) अपने साक्ष्य में कहाµ

‘‘जो लोग हमारी मुद्रा नीति को चलाते हैं उन्होंने 1905 के बाद से जानबूझ कर

ये प्रयास किए कि स्वर्ण को भारत में आने से और प्रचलन में आने से रोका

जाए।’’

कौंसिल बिलों ख्1, का इतिहास ईस्ट इंडिया कम्पनी के दिनों से शुरू होता है। भारत सरकार की एक विशेष स्थिति इस बात से पैदा होती है कि यह अपना राजस्व भारत में प्राप्त करती है और इसे भुगतान इंग्लैंड में करने होते हैं। इस तरह इसके लिए वह जरूरी हो जाता है कि भारत से इंग्लैंड को धन प्रेषित किया जाए। ईस्ट इंडिया कम्पनी के दिनों से ही नीति यह रही है कि यह धन इस तरह प्रेषित किया जाए कि सराफों का अंतरण न करना पड़े। ईस्ट इंडिया कम्पनी के डाइरेक्टरों के पास धन प्रेषित करने के तीन तरीके थेµ (1) भारत से सराफा इंग्लैंड भेजी जाए_ (2) भारत सरकार पर बिलों के बदले इंग्लैंड से धन प्राप्त किया जाए_ और (3) इंग्लैंड को माल भेजने के लिए खरीद के लिए भारत में व्यापारियों को पेशगी दे दी जाए और इंग्लैंड में कम्पनी के कोर्ट ऑफ़ डाइरेक्टर्स को, जिनके पास माल गिरवी रखा जाता है, उनका उन्हें पुनर्भुगतान किया जाए। इन तीनों में से अंतिम दो पर अधिक निर्भर रहा जाता था। कुछ समय बाद माल की गिरवी के बदले प्रेषण का तरीका छोड़ दिया गया क्योंकि इससे उधार का ‘‘एक दुष्चक्र शुरू हो जाता था जो व्यापार

  1. तुलना करेंµ भारत से होने वाले प्रेषणों की प्रणाली के संबंध में सर हेनरी वाटरफील्ड क़ा मेमोरेंडम,

फाउलर कमेटी की रिपोर्ट का परिशिष्ट, पृष्ठ 24, कौंसिल बिलों की बिक्री और तार द्वारा अंतरण के

बारे में एफ.डब्ल्यू नयू मार्च का मेमोरेंडम भी देखें। रॉयल कमीशन ऑन ‘इंडियन फाइनेंस एंड करेंसी’,

की अंतरिम रिपोर्ट का परिशिष्ट, खण्ड 1, सं. VIII, पृष्ठ 217