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स्वर्ण मानक की ओर वापसी

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करेंसी कमीशन ने इसे पुनः खोलने की सिफारिश की ख्1, और इस योजना का इतना जोरदार स्वागत हुआ कि सुप्रीम कौंसिल के एक माननीय सदस्य ने सरकार को इस बात का प्रलोभन दिया कि बजट अनुमानों में ‘‘मिन्ट’’ मद के अंतर्गत वह अधिक व्यवस्था रखी जाएगी ताकि सरकार उसका लागत व्यय उठा सके। तथापि, सरकार ने इस पेशकश को नामंजूर कर दिया। इस तरह अब भारत ही एकमात्र ऐसा अनूठा देश बन गया जहां 1853-93 के बीच स्वर्ण के कानूनी सिक्का न होने के बावजूद स्वर्ण टकसाल थी और 1893 से यद्यपि स्वर्ण कानूनी सिक्का है परन्तु कोई स्वर्ण टकसाल नहीं है। यह कल्पना करना कठिन है कि फाउलर कमेटी के आदर्श को पूरा करने के लिए केवल मुद्रा टकसाल क्या कर सकती है_ परन्तु स्वर्ण टकसाल

खोलने की सबसे बड़े समर्थक साक्षी (मि. वेब) की चैम्बरलेन कमीशन के सामने दी गई गवाही के इस उद्धरण से यह समझने में मदद मिलेगी कि स्वर्ण टकसाल से क्या अपेक्षा की जा सकती है।

‘‘स्वर्ण टकसाल से आप जिस मुख्य लाभ की अपेक्षा करते हैं कि आप प्रचलन

में स्वर्ण के सिक्के बढ़ा देंगेµ? यह कई प्रवृत्तियों में से एक पृवत्ति होगी।’’ क्या

और भी कोई लाभ है?µ एक लाभ यह है कि देश में मीट्रिक तंत्र की स्थापना

हो जाएगी और इस तंत्र का एक आवश्यक भाग समझता हूं कि एक टकसाल

होनी चाहिए जहां जनता की मांग पर मुद्रा ढाली जा सके।

‘‘मैं वास्तव में आपके कारण को समझना चाहता हूं कि यह आवश्यक क्यों

है। क्या मेरा यह समझना ठीक है कि आप उचित मुद्रा प्रणाली के लिए जरूरी

समझते हैं कि स्वर्ण की मुद्रा हो।

और क्या स्वर्ण की मुद्रा के लिए जरूरी है कि स्वर्ण टकसाल हो? हां, मौके

पर भारत में ही होनी चाहिए.... इससे एक तरह से विदेशी विनिमय की प्रबंध

व्यवस्था भारत सचिव के हाथों में नहीं रहेगी, क्योंकि एक टकसाल होगी जहां

जाकर जनता हमेशा अपने सोने को सिक्कों में बदलवा सकेगी ऐसा उस हालत

में होगा जब भारत सचिव कोई ऐसा कदम उठाए जिसे जनता पसन्द न करती

हो। यह एक ऐसा परिचय है, एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच है कि जनता अपना

सोना देकर तत्काल धन हासिल कर ले।’’

  1. कमीशन ने सिफारिश की कि यदि भारत में स्वर्ण टकसाल की स्थापना न की जाए, तो सरकार को

1906 में वापिस ली गई अधिसूचना पुनः जारी कर देनी चाहिए ताकि उचित शर्तों पर परिशोधित स्वर्ण

लिया जाए। रिपोर्ट, धारा 72

  1. रिपोर्ट, पैरा 67