280 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यहां पर भी यह मान कर चलना कि सोने की टकसाल का होना इस बात की गारंटी है कि सोने की मुद्रा होगी। परन्तु यह मानना भी इसी प्रकार ही निर्मूल है जैसे कि यदि सोने का मुक्त रूप से आयात होने दिया गया तो उसी से वह स्वर्ण मुद्रा का एक भाग बन जाएगा। दूसरी ओर, ऐसे कई उदाहरण हैं जब टकसालें खुली थीं, तब भी न तो सोने के सिक्के बनाए जाते थे और न ही स्वर्ण मुद्रा थी। लन्दन की रॉयल मिंट में सिक्कों की ढलाई के इतिहास में से कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। बैंक स्थगन अवधि 1797-1821 और पिछले महायुद्ध की अवधि 1914-18 इस दृष्टि से काफी प्रकाश डालते हैं। दोनों अवधियों में टकसालें खुली थीं। परन्तु सोने के कुल कितने सिक्के बने? सारी ‘‘सस्पेंशन’’ अवधि में नहीं के बराबर सोने के सिक्के बनाए गए। सन् 1807, 1812 और 1814-16 के बीच में एक भी सोने का सिक्का नहीं बनवाया गया। ख्1, पिछले महायुद्ध में भी 1915 के बाद स्वर्ण सिक्के बनने में गिरावट आई और 1917 के बाद से तो वे बनने कतई बन्द हो गए। ख्2, ये उदाहरण हैं पूर्ण तथा यह बताते हैं कि यद्यपि टकसाल एक उपयोगी संस्था होती है, तथापि टकसाल में कोई ऐसा जादू नहीं होता कि वह सोने को आकृष्ट करे। ऊपर जो उदाहरण दिए गए हैं_ उनसे यह निस्सन्देह सिद्ध हो जाता है कि स्वर्ण के सिक्कों का प्रचलन कई बातों पर निर्भर करता है और उनमें ऐसी टकसाल के होने या न होने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता जहां मुक्त रूप से सिक्के बनवाए जा सकते हैं।
अब यह राजकीय अर्थशास्त्र का सुस्थापित सिद्धांत है कि जब दो प्रकार के माध्यम मुद्रा के रूप में उपयोग में लाए जाते हैं_ तब बुरा माध्यम अच्छे माध्यम को प्रचलन से निकाल देता है। अब यदि इस सिद्धांत को भारत की स्थिति में लागू करें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि जब तक रुपये असीमित मात्रा में जारी किए जाते हैं_ तब तक भारत में स्वर्ण का प्रचलन नहीं हो सकता। जो लोग स्वर्ण मुद्रा जारी करने पर बराबर जोर देते हैं_ उन्होंने इस महत्त्वपूर्ण सिद्धांत को इतनी पूरी तरह अनदेखा कर दिया है कि उन्होंने असीमित मात्रा में रुपये जारी करने के विरोध में अंगुली तक नहीं उठाई। मि. वेब, इंडिया ऑफिस के अनाचारों के घोर विरोधी तथा इस विचारधारा के निष्ठावान समर्थक हैं कि यदि भारत सचिव को अपनी धन निकालने की मात्रा कम करने पर विवश कर दिया जाए तो भारत में स्वर्ण जाएगा और वहां मुद्रा का एक भाग बन जायेगा। उन्होंने चैम्बरलेन कमीशन को सिफारिश की किµ
देखेंःµ जी.आर. पोर्टर ऑफ दी नेशन (प्रथम सं.), पृष्ठ 568
देखेंःµ रिपोर्ट ऑफ दि डिप्टीमास्टर ऑफ दि रॉयल मिंट 1921