स्वर्ण मानक की ओर वापसी
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‘‘कौंसिल ड्राफटों की बिक्री केवल होम चार्जिज की आवश्यकता पूरी करने तक
की सीमा पर रहे इसे कड़ाई से पालन कराया जाए। और किसी भी परिस्थिति
में आवंटन राशि 1 शि. 4आयात के बिन्दु के बराबर नीचे न जाने दिया जाए। एक दफ़ा लन्दन में होम 1/8 पैंस से 1 शि. 4 3/32 पैंस से अर्थात् भारत में स्वर्ण
चार्जिज के लिए आवश्यक धन ले लेने के बाद कौंसिल ड्राफट की आगे बिक्री
रोक देनी चाहिए। केवल नए प्रतीक सिक्के बनाने के लिए धातु खरीदने की
अनुमति होनी चाहिए और इसके बारे में जनता को अधिसूचना जारी करके बता
देना चाहिए। कौंसिल ड्राफट की ऐसी विशेष बिक्री स्वर्ण आयात के धातु बिन्दु
से नीचे कभी नहीं की जानी चाहिए।’’
और फिर सर वी. थैकरसे ने 22 मार्च, 1922 को लैजिस्लेटिव कौंसिल में अपना एक प्रस्ताव पेश करके सरकार से भारत में स्वर्ण सिक्के ढालने की टकसाल खोलने के लिए अपने भाषण में कहाµ
‘‘एक मुद्दे पर मैं अपनी एक बात साफ कर देना चाहता हूं। मैं यह सुझाव नहीं
दे रहा कि सरकार रुपये ढालने का अधिकार छोड़ दे या जब जनता रुपयों की
मांग करे तो वे देने से इंकार कर दें। मैं गोल्ड स्टैंडर्ड रिजर्व को भी नहीं छूना
चाहता। यह हमारी मुद्रा का निर्णायक गारंटी के रूप में बना ही रहना चाहिए। मेरा
प्रस्ताव वर्तमान व्यवस्था में किसी भी तरह हस्तक्षेप नहीं करना चाहता। यह तो
केवल उसका पूरक है....। भारत सरकार को अपनी क्षमता के अनुसार अधिकतम
सीमा तक स्वर्ण इकट्ठा करने दो परन्तु जिस बेशी सोने का वह समावेश नहीं
कर सकती, उसके सिक्के बना दिए जाएं और जनता चाहे तो उसे दे दिए जाएं।
हमारे बढ़ते हुए व्यापार और संतुलन को हमारे पक्ष में होने के कारण साधारण
समय में भी सोने का आयात किया जाता रहेगा और यदि भारत में ढालने की
सुविधाएं दी जाएं तो वह प्रचलन में भी आजाएगा।’’ ख्1,
निस्सन्देह ये स्वर्ण मुद्रा को प्रोत्साहन देने के तरीके नहीं हैं, वास्तव में ये उसके बिल्कुल विपरीत हैं। जब तक रुपये के सिक्के बनाए जाते रहेंगे, स्वर्ण हमारी मुद्रा का भाग नहीं बनेगा। एक ओर हम इन बातों के विरोध में आवाज उठाते हैं कि भारत सचिव भारी मात्रा में धन निकालता है जिसके फलस्वरूप भारतीय निधि लन्दन में अंतरित हो जाती है और भारत सचिव उसकी व्यवस्था गलत ढंग से चलाता है और दूसरी ओर उसे रुपयों के अधिक प्रतीक सिक्के बनाने की अनुमति दी जाती है। इससे न केवल मुद्रा के मूलभूत सिद्धान्त के बारे में अज्ञानता प्रगट होती है अपितु इससे पता चलता है कि वे इस बात को समझने में पूरी तरह असफल रहे हैं कि यह सारी मुसीबत
- एस.एल.सी.पी., खण्ड-2, पृष्ठ 637-38