282 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
शुरू होने का उद्गम कहां है। यह सच है कि भारत सरकार भारत सचिव को कोई विशेष कदम उठाने के लिए बाध्य नहीं कर सकती ख्1, और वह अक्सर वार्षिक बजट के उपबंधों की अवहेलना कर देता है। परन्तु सवाल बना रहता है। यह कैसे हुआ कि 1893 के बाद वह इतना अधिक निकाल सका जितना पहले कभी नहीं निकाला गया था? यह अवश्य याद रखना चाहिए कि भारत सचिव लन्दन में निधियों के साथ जो कुछ भी करता है, अपने निकाले गए धन की अदायगी उसे भारत में अवश्य करनी पड़ती है। 1893 से पहले वह कम निकालता था क्योंकि उसके भुगतान के साधन कम थे_ 1893 के बाद उसने अधिक निकाला क्योंकि उसके भुगतान के साधन अधिक थे। और उसके भुगतान के साधन अधिक क्यों हो गए? केवल इसलिए कि वह रुपये के सिक्के ढालने में समर्थ है। रकम निकालने की सीमा यह होती है कि उनकी मांग कितनी है और रुपये ढालने की उसकी क्षमता कितनी है। इसलिए भारत सचिव पर यह आरोप लगाना मूर्खता होगी कि वह भारत के हितों से विश्वासघात करता है जबकि उसी के साथ-साथ उसे रुपये ढालने की अनुमति दी जा रही है, जिसके कारण वह भारत के हितों से विश्वासघात कर सकता है। यदि स्वर्ण मुद्रा की आवश्यकता है और इसलिए आवश्यकता है क्योंकि रुपया मूल्य का बुरा मान है, तब जरूरी यह नहीं है कि भारत सचिव द्वारा निकालने पर सीमा लगा दी जाए अथवा स्वर्ण टकसाल खोल दी जाए। इसके लिए तो छोटा-सा कानून बना कर रुपयों का ढालना बन्द कर देना चाहिए। केवल तभी स्वर्ण को कानूनी मुद्रा बनाया जा सकेगा जिसका रुपये से एक उपयुक्त अनुपात हो और तभी वह भारतीय मुद्रा का भाग बन सकेगा।
रुपये के सिक्के बनाना बन्द करना इसका पर्याप्त उपाय है, इसकी बहुत अच्छी परिपुष्टि भारतीय मुद्रा के इतिहास की 1898-1902 की एक विस्तृत घटना से मिलती है। स्वर्ण को कानूनी मुद्रा बनाए जाने के डेढ़ वर्ष की थोड़ी-सी अवधि के बाद ही, जब भारत में कोई स्वर्ण टकसाल भी नहीं थी, तब भी माननीय श्री सी.ई. डॉकिन्स ने मार्च, 1901 में अपने बजट भाषण में कहा थाµ
‘‘अंततोगत्वा भारत स्वर्ण मुद्रा के अपने संक्रमण काल से निकल आया है जिसके
लिए वह वर्षों से संघर्ष कर रहा था, उसने स्वर्ण मान और एक स्वर्ण मुद्रा की
स्थापना कर दी है और व्यावहारिक रूप से विनिमय स्थिर हो गया है जिससे
व्यक्तियों को भी और सरकारी वित्त को भी राहत मिली है।’’ ख्2,
- भारत सचिव की कानूनी स्थिति के बारे में और किस सीमा तक उसे भारत सरकार द्वारा पास किए गए
किसी कानून के उपबन्धों से बांधा जा सकता है, इसकी बड़ी अच्छी व्याख्या सर जेम्स वेस्टलैंड ने
इंडियन पेपर करेंसी (अमेंडमेंट) विधेयक पर बोलते हुए अपने भाषण में की थी। बाद में यही विधेयक
1898 का अधिनियम II बना। उक्त अधिनियम की विशिष्ट शब्दावली से भी तुलना कीजिए। 2. वित्तीय वक्तव्य 1900-1, पृष्ठ 14