स्वर्ण मानक की ओर वापसी
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स्वर्ण के बारे में उत्साह इतना अधिक था कि मि. डॉकिन्स ने यह भी कहा कि ख्1,
‘‘...स्वर्ण से...हम लगभग अभिभूत हो गए हैं...’’ तब मुद्रा की स्थिति में जो परिवर्तन आया, उसे तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने बड़े सजीव ढंग से इन शब्दों में व्यक्त किया ख्2,
‘‘मि. डॉकिन्स ने...सफलतापूर्वक एक नए युग का उद्घाटन किया है, जिसके अंतर्गत भारत में सॉवरेन कानूनी सिक्का बन गया है और भारत में विनिमय में स्थिरता आ गई है जो रूढि़ क्रुद्ध ढंग का हो सकता है। यह बड़ा परिवर्तन बुरी-बुरी भविष्यवाणियों के बावजूद किया गया, और विशेषकर इस भविष्यवाणी के बाद कि हो सकता है कि भारत में सोना आए ही नहीं, और यदि आ भी गया तो हमारे हाथों में नहीं रह सकेगा और हमारी अंगुलियों से इतनी तेजी से फिसल जाएगा, कि आवश्यक सप्लाई बनाए रखने के लिए भी हमें वह उधार लेना पड़ेगा। वास्तविकता यह है कि हम लगभग उस पौराणिक राजा की स्थिति में है जिसने प्रार्थना की थी कि जिस चीज को भी वह छुए, वह सोने की हो जाए और बाद में वह यह देख कर भौचक्का रह गया कि उसका भोजन भी उसी धातु में बदल गया था जो हजम ही नहीं हो सकती थी। हमें वास्तव में इतना अधिक सोना मिल गया है कि हम सोने के बदले रुपये दे रहे हैं और रुपयों के बदले सोना अर्थात् हम पूर्ण परिवर्तनीयता की ऐसी सुखदायी स्थिति में आ गए हैं जिसे विशेषतः एक वर्ष पहले भी असम्भव कह कर उसका मजाक उड़ाते।’’
उदाहरण के लिए 1900-1 की स्थिति की तुलना 1910-11 की वर्तमान स्थिति से कीजिए। उस वर्ष मुद्रा की जैसी स्थिति थी, उसके बारे में माननीय सर जेम्स (अब लॉर्ड) मेस्टन ने कहा थाµ
‘‘हम मुद्रा नीति के कई परिवर्तनों में से गुजरे हैं जिनमें से बहुत से गलत भी थे परन्तु मौटे-तौर पर हमारे कदम और उद्देश्य गलत नहीं हैं और अपने आदर्श की ओर निरंतर पहुंचने में हमने किसी मूलभूत चीज को छोड़ा नहीं है। फाउलर कमेटी के दिनों से हम वास्तविक और बिना किसी व्यवघात के प्रगति करते रहे हैं। अंततः इस आदर्श तक पहुंचने के लिए हमें अभी भी एक बड़ा कदम उठाना है। हमने भारत को दुनिया के स्वर्ण देशों से जोड़ दिया है। हम स्वर्ण विनिमय मान तक पहुंच गए हैं जिसे हम बराबर विकसित कर रहे हैं और निरंतर सुधार कर रहे हैं। अगला और निर्णायक कदम संचयी स्वर्ण मुद्रा होगा और मुझे पूरी आशा है कि कुछ समय बाद यह आएगी ख्3, ....’’
वित्तीय वक्तव्य, 1900-01, पृष्ठ 19
उल्लिखित, पृष्ठ 167
फाइनेंशियल स्टेटमेंट, 1910-11, पृष्ठ 346