286 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हो गया। इसलिए भारत सचिव ने फैसला किया कि क्रमशः दरें बढ़ा कर इनकी मांग को सीमित कर दिया जाए_ इस तरह बहुत जरूरी मांगों को पूरा कर दिया जाए और कम जरूरी मांगों को छोड़ दिया जाए और जिन लोगों की मांग बहुत जरूरी नहीं, उन्हें चेतावनी दे दी जाए कि वे भारत को स्वर्ण भेज दें। और कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं था। भारत सचिव का यह दायित्व माना गया कि वह 1 शि. 4 4/32 पैंस पर भुगतान बंटता रहे। परन्तु मुझे नहीं लगता कि उसका कोई ठोस दायित्व है_ और मुझे इस बात पर आश्चर्य होता है कि जो लोग यह मानते हैं कि यह दायित्व विद्यमान है (और जो इसी स्थिति को अच्छी तरह समझता है) वो यह कैसे मानते हैं कि हमारी मुद्रा की स्थिरता पर रुपयों के रिजर्व के तेजी से कम होने का प्रभाव पड़ेगा (और जिसे रुपयों के अधिक सिक्के ढाले बिना बढ़ाया नहीं जा सकता)।
और जब स्वर्ण मुद्रा वाले स्वर्णमान का आदर्श प्राप्त किया ही जाने वाला था, तभी सर एडवर्ड लॉ को भारत का वित्त मंत्री बना दिया गया और एक निर्दयी डाकू की तरह नई मुद्रा के सारे ढांचे को तहस-नहस करके रख दिया। उसका यह कदम अत्यंत मूर्खतापूर्ण और मनमाना था। उसके 28 जून, 1900 के कार्यवृत्त ने सारा घटनाक्रम1 ही बदल दिया। उस कार्यवृत्त में निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण पैरा थाःµ
‘‘15. इन बातों के परिणामस्वरूप, मेरे विचार में यह स्वीकार कर लिया जाना चाहिए कि मुद्रा के रिज़र्व में सोने की जितनी मात्रा रखी जा सकती है, उनका नियमन उन्हीं नियमों द्वारा किया जाना चाहिए जो इस बारे में मार्गदर्शन करेंगे कि वह राशि कितनी होनी चाहिए कि जिसके आधार पर सरकारी सिक्यूरिटियों में लगाया गया अनुपात आराम से बढ़ाया जा सके। प्रचलन में नोटों की संख्या बढ़ाने तक या वर्तमान शर्तों में कोई परिवर्तन करने तक, मेरे विचार में करेंसी रिज़र्व में अधिकतम 7,000,000 पौंड स्वर्ण के रूप में आराम से रखे जा सकते हैं। तथापि मैं अपने-आप को हर हालत में इस आंकड़े से बांध कर नहीं रखना चाहूंगा, क्योंकि यह राशि अपनी ही इच्छा से निर्धारित की गई है और विशेषतौर पर मैं कोई ऐसी सार्वजनिक घोषणा करके सरकार के हाथ नहीं बांधना चाहूंगा क्योंकि हो सकता है कि किन्हीं अनदेखी घटनाओं के फलस्वरूप बाद में इसमें कमी करना वांछनीय हो जाए।’’
- इस कार्यवृत्त की एक प्रति के लिए तथा तत्सम्बंधी पत्राचार के लिए ‘इन्टरिम रिपोर्ट ऑफ दी चैम्बरलेन
कमीशन’ का परिशिष्ट- V देखें। Ed . 7070, 1913 का)