स्वर्ण मानक की ओर वापसी
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इस कार्यवृत्त की रूपरेखा, संशोधित रूप से भारत में मुद्रा प्रणाली का आधार यह बनाया गया है कि मुद्रा रिजर्व के लिए अधिकतम कितना स्वर्ण रखा जाए। परंतु इस कार्यवृत्त के लेखक ने शायद अपने से कभी एक क्षण के लिए भी यह प्रश्न नहीं पूछा कि स्वर्णमान डंडे और स्वर्ण मुद्रा के आदर्श का क्या होगा? क्या वह स्वर्णमान को पूर्णता तक पहुंचाना चाहता था, या इसे समाप्त करना चाहता था और इसलिए स्वर्ण रखने की एक सीमा बांधना चाहता था। इस कार्यवृत्त की नीति को अमल में लाने से पहले भारतीय मुद्रा प्रणाली लगभग बैंक चार्टर एक्ट, 1844 के मुताबिक चल रही थी जिसको रुपये सीमित मात्रा में जारी किए जाते थे और स्वर्ण असीमित मात्रा में। इस कार्यवृत्त में यह प्रस्ताव किया गया था कि स्वर्ण जारी करने की मात्रा सीमित हो और सिक्कों की असीमित_ यह बैंक सस्पेंशन अवधि की प्रणाली का बिल्कुल उल्टा था। उस कार्यवृत्त की यही महत्वपूर्ण बात थी जिसमें जानबूझ कर भारतीय मुद्रा स्वर्ण की जगह रुपयों को दी गई थी और इस तरह 1893 से हम जिस आदर्श की दिशा में चल रहे थे और 1900 तक जिसे लगभग प्राप्त कर लिया गया था, उसे कतई छोड़ दिया गया।
यदि सर एडवर्ड लॉ ने यह समझ लिया होता कि इसका अर्थ स्वर्णमान को छोड़ देना होगा, तो शायद वह कार्यवृत्त लिखते नहीं। परंतु ऐसी कौन सी बातें थीं जिनकी वजह से उसके स्वर्णमान और स्वर्ण मुद्रा की नीति को छोड़ दिया और मुद्रा के रुपये अंश की जगह उसके स्वर्ण अंश पर सीमा लागू कर दी। इन बातों का उल्लेख भारत सरकार के दिनांक 6 सितम्बर, 1900 के प्रेषण सं. 302 में किया गया है। इसमें कहा गया है-
‘‘2. पिछले दिसम्बर से स्वर्ण की प्राप्तियां आती रहीं और बढ़ती रहीं। जून 18
के प्रेषण में जो सीमाएं दी गई थीं लगभग आठ महीने तक करेंसी रिजर्व में
सोना उससे बढ़ा रहा और चांदी घटी रही। जनवरी के मध्य तक भारत में करेंसी
रिजर्व में सोने का स्टॉक बढ़कर 5,000,000 पौंड हो गया। इस प्रेषण में दिए
गए प्रस्ताव को तत्काल अमल में ले आया गया। इसके बाद हमने बड़े जिला
खजानों को सावरेन भेज दिए गए और उन्हें यह निर्देश दिए गए कि जिन्हें भी
इच्छा हो, उन्हें मिलने वाली अदायगी के रूप में या रुपयों के बदले उन्हें सावरेन
दे दिए जाएं, और मार्च में हमने डाकघरों से कहा कि प्रेसिडेंसी शहरों में और
रंगून में सभी मनी ऑर्डरों का भुगतान सावरेनों में किया जाए_ और हमने सभी
प्रेसिडेंसी बैंकों से भी अनुरोध किया कि जहां तक संभव हो, प्रेसिडेंसी शहरों
और रंगून में सरकारी लेखे में सावरेन में भुगतान किया जाए। ये सब कदम उठा
लिए गए, इस आशा में इतने नहीं कि इससे निकट भविष्य में हम अपने पास
पड़े फालतू सोने से छुटकारा पा लेंगे अपितु इस आशा में कि इससे लोग स्वर्ण