7. स्वर्ण मानक की ओर वापसी - Page 303

288 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के आदी हो जाएंगे और इस तरह वह समय जल्दी आ जाएगा कि जब स्वर्ण के

सिक्के प्रचलन में पर्याप्त मात्रा में आ जाएंगे और ऐसा करके भविष्य के वर्षों

में हमे उन कठिनाइयों से छुटकारा मिल जाएगा जो हम स्वर्ण का भंडार बढ़ने

और रुपयों का भंडार कम होने के कारण अनुभव कर रहे थे।

‘‘3. इन कठिनाइयों का सामना करने के लिए और यदि संभव हो तो इतने रुपये

प्राप्त करने के लिए, जिससे हम नोट लाने वालों और स्वर्ण के निवेदिका देने वालों

को रुपयों के सिक्के दे सकें, हमने अतिरिक्त रुपये ढालने शुरू कर दिए....

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‘‘14. यहां हम बताना चाहते हैं कि हमने पैरा 2 में बताए गए उपायों के प्रिणाम

को बड़े ध्यान से देखा है। स्वर्ण काफी बड़ी मात्रा में जारी किया गया_ पर

बहुत सारा हमारे पास मुद्रा विभाग और प्रेसिडेंसी बैंकों के जरिए वापस आ

गया। महानियंत्रक ने अनुमान लगाया कि जून के अंत में, उस समय तक जारी

लगभग 20 लाख सिक्कों में से 12 ½ लाख प्रचलन में थे। परंतु इस गणना में

कई अनिश्चित आंकड़े हैं। हम अभी भी यह कहने की स्थिति में नहीं हैं कि

स्वर्ण का उपयोग मुद्रा के रूप में किसी बड़ी सीमा तक होने लगा है।

‘‘15. यह बहुत ही वांछनीय है कि हम इस बारे में आश्वस्त हों तो हम रुपयों

की जनता की मांग पूरी कर सकते हैं जो कि करेंसी नोट और स्वर्ण प्रस्तुत

करने से पता चलती है। इसलिए हम महामान्यवर से जोरदार अनुरोध करते हैं कि

(रुपयों के) और सिक्के ढालने की अनुमति तत्काल दी जाए।

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‘‘17. परन्तु हम नहीं चाहते कि हमारे प्रस्ताव अभी बताए गए तर्कों के अधीन

समझे जाएं। हम तो मुख्यतः व्यावहारिक दृष्टि से यह आवश्यक समझते हैं कि

हम अपना दायित्व पूरा कर सकें, यद्यपि उसे पूरा करने के लिए हम कानूनन

बाध्य नही हैं परन्तु यदि बहुत असुविधा न हो तो इसे पूरा करना वांछनीय समझते

हैं। स्वर्ण के जो भी निविदा देने वाला हो और नोट लाएं, और जो सावरेन के

मुकाबले रुपये को प्राथमिकता देते हैं, उन सबको रुपये दे सके।’’

यहां रुपये ढालने के लिए जो तर्क दिए गए हैं_ वे बड़े हास्यास्पद हैं। पहले-पहल तो यही बात कभी सुनी नहीं गई कि जो सरकार स्वर्णमान की और स्वर्ण मुद्रा की स्थापना करना चाहती थी, वह इसी बात से घबरा जाए कि इसके पास सोने की मात्रा बढ़ गई है जबकि उसे तो इस बात से बहुत खुश होना चाहिए था कि उसका विचार तेजी से मूर्त रूप ले रहा है। इसके मनोवैज्ञानिक पहलू को छोड़ भी दिया जाए तो भी, जैसा कि सरकार के