स्वर्ण मानक की ओर वापसी
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अपने वक्तव्य से स्पष्ट है, सरकार ने दो कारणों से रुपयों के सिक्के ढालने शुरू किएµ (1) सरकार ने अपने आप इसे अपना दायित्व समझा कि जो कोई मांगेगा, उसे रुपया दे देगी, और (2) लोग सोना नहीं चाहते। इन तर्कों के पीछे कितना जोर है? जहां तक पहला तर्क है, यह समझना कठिन है कि सरकार ने इसे स्वयं ही अपना दायित्व क्यों समझा कि रुपये दे। ऋणी का दायित्व यह होता है कि देश की वैध मुद्रा में अदायगी करे। स्वर्ण को वैध मुद्रा बना दिया गया था और सरकार बिना किसी संकोच या शर्म के उसमें अदायगी कर सकती थी। दूसरी इस बात का क्या प्रमाण है कि लोग सोना नहीं चाहते। यह कहा जाता है कि सरकार ने जिस सोने में भुगतान किया, वह सरकार के पास वापस लौट आया और यह इस बात का प्रमाण है कि लोग इसे नहीं चाहते। किन्तु यह एक भ्रम है। भारत जैसे देश में सरकारी देयराशि लोगों के व्यय का एक बड़ा भाग होती है और यदि लोग इसकी अदायगी स्वर्ण में करते हैंµसरकार को स्वर्ण की वापसी का यही मतलब हैµतो यह तो इस धारणा का समर्थन करता है कि लोग मुद्रा के रूप में स्वर्ण का उपयोग करना चाहते हैं। पंरतु यदि यह सच है कि लोग सोना नहीं चाहते तो इस तथ्य की क्या व्याख्या हो सकती है कि लोगों की मांग पर भी सरकार सोना देने से मना करती है? इसके लिए बराबर इंकार करना क्या इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसकी मांग बराबर रहती है। इस ढंग की व्याख्या में कोई संगति नहीं है। तथ्य यह है कि एक बात का इतना भ्रामक समर्थन करना सरकार इसलिए चाहती है कि लोगों का ध्यान इस सच्चाई से हट जाए कि सरकार इसलिए रुपये के सिक्के ढालना चाहती है इसलिए नहीं कि लोग सोना नहीं चाहते बल्कि सरकार चांदी के अतिरिक्त सिक्के ढालने से होने वाले लाभ से स्वर्ण का रिजर्व बनाना चाहती है। सरकार का यह निहित उद्देश्य सर एडवर्ड लॉ के कार्यवृत्त से बिल्कुल साफ पता चल जाता है। यह तर्क कि लोग सोना नहीं चाहते आदि-आदि केवल सही प्रयोजन को छुपाना था, कार्यवृत्त के निम्नलिखित भाग से स्पष्ट पता चल जाता है जिसमें लेखक ने तर्क दिया है कि-
‘‘16. यदि यह स्वीकार कर लिया जाए कि वर्तमान स्थिति में करेंसी रिजर्व
में अधिकतम 7,000,000 पौंड की राशि को स्वर्ण में रखा जा सकता है, उन
दस करोड़ रुपयों के अतिरिक्त जिनका निवेश पहले किया जा चुका है, तो इस
रिजर्व में चालाकी से जोड़-तोड़ करके भी जो सहायता प्राप्त की जा सकती है,
तो इससे भी इस राशि को स्वर्ण में प्राप्त करने में सफलता नहीं मिलेगी जो कि
स्थिर विनिमय को बनाए रखने के लिए रखना उपयोगी समझा जाता है। अभी तक
किसी भी प्राधिकारी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि इस प्रयोजन के लिए कितनी
निश्चित राशि की आवश्यकता पड़ेगी, परंतु इस बारे में आम सहमति है और मैं
भी इससे सहमत हूं कि काफी बड़ी रकम की जरूरत पड़ेगी। इतनी बड़ी राशि