7. स्वर्ण मानक की ओर वापसी - Page 306

स्वर्ण मानक की ओर वापसी

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यह सच है। परन्तु जो लोग सरकार पर आरोप लगाते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि उसी कमेटी ने यह सिफारिश भी की थी-

‘‘रुपयों के और सिक्के ढालने का एकमात्र अधिकार भारत सरकार के पास ही

रहना चाहिए, और चाहे रुपयों का वर्तमान भंडार कुछ समय के लिए पर्याप्त

हो, अंततः ऐसे विनिमय बनाने की आवश्यकता पड़ेगी ही कि कितने अतिरिक्त

सिक्के ढाले जाएं। सरकार को स्वर्ण के बदले रुपये देते रहने चाहिए, परंतु रुपये

के नए सिक्के तब तक नहीं ढाले जाने चाहिए जब तक कि मुद्रा में सोने का

अनुपात जनता की आवश्यकताओं से बढ़ न जाए। हम यह भी सिफारिश करते

हैं कि रुपये के सिक्के ढालने से जो मुनाफा हो, न तो उसे राजस्व में डाला जाए

और न ही सरकार के सामान्य शेष बाकी या बकाया के एक भाग के रूप में

रखा जाए_ अपितु इसे स्वर्ण के रूप में, एक विशेष रिजर्व में रखा जाए जो कि

कागजी मुद्रा रिजर्व या सामान्य खजाना बकाया से कतई अलग रखा जाए (और

जब कभी विनिमय मूल्यवान धातु (स्पीशि) बिन्दु से नीचे गिर जाए तो विदेशी

अदायगियां करने के लिए उसे मुक्त रूप से उपलब्ध कराया जाए)।

जब कमेटी की दोनों सिफारिशें एक साथ ली जाएं, तो फिर अंतर ही कहां रहा है। सरकार ने बिल्कुल वही किया है जिसकी समिति ने सिफारिश की थी। यह विचित्र लगता है कि भारत सरकार या चैम्बरलेन कमीशन ने एक क्षण के लिए यह मान लिया था कि इन सिफारिशों से थोड़ा-सा हटा गया था क्योंकि सर एडवर्ड ला ने जो कार्यवृत्त भारत मंत्री को भेजा था, उसकी शुरूआत ही जिस बात से होती है, उससे पता चलता है कि सरकार ईमानदारी से फाउलर कमेटी की सिफारिशों पर चल रही थी। उसमें कहा गया है किµ

‘‘अपने 24 अगस्त, 1899 के डेस्पेच सं. 301 में हमने इंडियन करेंसी कमेटी (अर्थात फाउलर कमेटी) के पैरा 60 के संदर्भ में, जिसमें लिखा था कि रुपये के सिक्के ढालने से जो लाभ हो, उसे एक विशेष रिजर्व के रूप में स्वर्ण में रखा जाए, वह पैरा हमारी नजरों से ओझल नहीं है_ परंतु अतिरिक्त रुपयों के लिए सिक्के ढालने की कुछ समय तक आवश्यकता पैदा होने की आशा नहीं_ और इस बारे में आसानी से निर्णय कुछ समय के लिए रोका जा सकता है।

सर एडवर्ड ने जो कुछ किया, वह यह था कि मौका पड़ने पर सिफारिश को अमल में ले आए। इस दृष्टि से भारत सरकार को बुरा-भला कहने का कोई मतलब नहींµ उस स्थिति में जब रुपये के सिक्के ढालने के कारण स्वर्ण मुद्रा सहित स्वर्णमान अपनाना असफल हो गया हो। परंतु, यद्यपि भारत सरकार ने अपनी अज्ञानतावश इसका दोष अपने सिर पर ले लिया है, वास्तव में दोष उस पर लगाना ठीक नहीं कहा जा