स्वर्ण मानक की ओर वापसी
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लिए स्वर्ण के सिक्कों के समकक्ष होते हैं। जहां तक बहुमूल्य धातु का प्रश्न है,
अंतर्राष्ट्रीय भुगतानों के लिए फ्रांस और संयुक्त राज्य अमरीका दोनों अंततोगत्वा
भुगतान के अंतराष्ट्रीय माध्यम अर्थात स्वर्ण पर निर्भर करते हैं। अंत में, यह उनका
अपना स्वर्ण ही होता है जो विदेशी विनिमय की मार्फत, आंतरिक कार्यों के लिए
उनकी मुद्रा का उसके अंकित मूल्य पर बनाए रखने में मदद देता है।
‘‘भारत में मुद्रा का प्रश्न वैसा ही है जैसा हमने पिछले पैरे में देखा है। इसलिए
इस देश के लिए, जहां की स्थिति फ्रांस और अमरीका जैसी है, हम किसी
अलग नीति की सिफारिश नहीं करना चाहते और इसलिए भारत सरकार पर कोई
ऐसा कानूनी दायित्व नहीं सौंपना चाहते कि उसे रुपये के बदले सोना देना पड़े
अथवा दूसरे शब्दों में धारकों की मांग पर भारत सरकार को सोना देना पड़े।
भारत सरकार पर ऐसा दायित्व थोपने का अर्थ होगा कि एक क्षण के नोटिस
पर ही भारत सरकार को इतने सोने की व्यवस्था करनी पड़ेगी जिसे पहले से
नहीं बताया जा सकता, और यह देयता ऐसी है जिसे हमारी राय में स्वीकार नहीं
किया जाना चाहिए।’’
यद्यपि कमेटी को अपनी दी गई राय पर पूरा विश्वास था, तथापि वह उन लोगों की बात से भी काफी प्रभावित थी जो भारी संख्या में रुपयों का प्रचलन देखते हुए, इस पर संदेह करते थे।
‘‘कि भारतीय टकसालों में चांदी का सिक्का न ढालने मात्र से ही क्या व्यवहारतः_
रुपया मुद्रा पर इतनी पाबंदी लग जाएगी कि वह स्थायी रूप से रुपये को स्वर्ण
में एक निश्चित दर पर परिवर्तनीय बना देगी।’’
कमेटी इन संदेहों से इतनी अधिक हिल गई थी कि उसने यह स्वीकार किया कि ख्1,
‘‘जिन शक्तियों का रुपये के स्वर्ण मूल्य पर प्रभाव पड़ता है, वे इतनी जटिल
हैं और उनका काम करने का तरीका इतना अस्पष्ट या दुरूह है कि हम पक्के
तौर पर यह कहने की स्थिति में नहीं हैं कि चांदी के लिए टकसालें बंद कर
देने मात्र से, मांग की दृष्टि से रुपयों पर सीमा लग जाएगी जिससे रुपया स्थायी
रूप से एक निश्चित दर पर स्वर्ण में परिवर्तनीय बन जाएगा।’’
कमेटी का विचार था ऐसी आकस्मिक स्थिति से बचने के लिए जब कभी रुपया विशेष बिन्दु से नीचे गिरे, भारत सरकार को विदेशी भुगतान के लिए रुपयों को स्वर्ण
- रिपोर्ट, पैरा 58