दोहरे मानक से रजत मानक तक
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मानकऽ की अपेक्षा समानान्तर मानक कहा [†] । यह स्पष्ट है कि व्यवहार में कुछ क्षति के बिना अनुपात की कमी का आकलन नहीं किया जा सका। परंतु इस पर ध्यान दिया जाना दिया जाना चाहिए कि ऐसी विलक्षण युक्ति में आरामदायक परिस्थिति मौजूद थी जिसके द्वारा एक-दूसरे से असंबंधित मोहर और रुपया साम्राज्य [‡] के तांबे के सिक्के दाम के निर्धारित अनुपात में था। अतः यह मानने योग्य है कि एक जैसी वस्तु से स्थायी रहने के फलस्वरूप मोहर और रुपया दोनों ही सिक्के निर्धारित अनुपात में परिचालित थे।
दक्षिण भारत में, जहां मुगलों का प्रभाव था चांदी के सिक्के का प्रचलन नहीं था वहां प्राचीन हिंदू राजाओं का सोने का सिक्का पगोडा मानक मूल्य के रूप में प्रचलित था तथा विनिमय का माध्यम था तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के आने तक इसका प्रचलन जारी था।
मुगल सम्राटों ने सदैव सिक्का ढालने का अधिकार ‘‘इंटर जूरा मैजिस्टैटिस’’ ख्1, के रूप में समझा और इसका श्रेय उन्हें जाता है कि इसे उन्होंने इस उत्तरदायित्व की भावना से कार्यान्वित किया। मुगल सम्राटों ने अपने सिक्कों की गुणवत्ता कभी कम करने की नीचता नहीं दिखाई। मुगल सम्राटों ने सिक्का ढालने की अपरिपक्व टैक्नॉलाजी
ऽ मनी एंड मेकनिज्म ऑफ एक्सचेंज (1890) पृष्ठ 95
† डॉ.पी.केली का विचार यह है कि उन्होंने अपने बाजार के अनुपात (स्था.उद्धरण) से परिचलित किया
है। दूसरी ओर, सर आर. टेम्पल का कहना हैः ‘‘प्राचीन और मध्यकालीन भारत में प्रत्येक धातु के
सिक्कों का तुलनात्मक मूल्य राज्य द्वारा निर्धारित किया गया था और औपचारिक सीमा के बिना सभी
सिक्के वास्तव में वैध सिक्के माने गए थे।’’ (‘‘जनरल मॉनेट्री प्रेक्टिस इन इंडिया’’ भारत में सामान्य
मुद्रा का व्यवहार जर्नल ऑफ दी इन्स्टीट्यूट ऑफ बैंकर्स खंड II, पृष्ठ 406’’)। अन्य किसी दूसरे
अवसर पर उन्होंने कहाः ‘प्राचीन हिन्दू मुद्रा एकल मानक के साथ स्वर्ण की बनी थी। मुसलमानों ने
चांदी की मुद्रा प्रारंभ की और बाद में ब्रिटिश शासन काल में स्वर्ण और चांदी दोनों का दोहरा मानक
बन गया, (वही, खंड XV, पृष्ठ 9)। इसकी तुलना में इस बात पर ध्यान दिया जाए कि प्रीएम्बल टु
करैंसी रैगुलेशन्स XXXV, 1793 और प्रारंभिक समय के अन्य मुद्रा विनिमय इस बात पर जोर देते
हैं कि ब्रिटिश शासन काल से पूर्व मोहर और रुपये के बीच कोई अनुपात निर्धारित न था। ‡ देखिए- इंडियन जर्नल ऑफ इकॉनामिक्स, जुलाई, 1918 पृ. 169 पर प्रोफेसर एस.वी. वेंकटेश्वर का
लेख- ‘‘मुगल करैंसी एंड कौइनेज (मुगल कालीन मुद्रा और सिक्के)’’ और एफ एटकिंसन ‘‘द इंडियन
करैंसी किशचन कुएं (भारतीय मुद्रा का प्रश्न) (1894)’’ पृष्ठ 91
- मुस्लिम इतिहासकार खाझी खाँ के अनुसार इस बात ने सम्राट औरंगजेब को नाराज कर दिया कि 1694
में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने सम्राट के नाम पर बम्बई में रुपये के कुछ सिक्के ढाले (इम्पोरियल
गजेटियर ऑफ इंडिया, खंड IV पृ. 515)।
- इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया (खंड IV, पृष्ठ 514) में यह बताया गया है कि दिल्ली में केवल
एक टकसाल थी जिसमें शाही सिक्के ढाले जाते थे। सम्राट शेरशाह ही पहले सम्राट थे जिन्होंने सिक्का
ढालने के लिए अनेक टकसालों को प्रारंभ किया और यह प्रथा अकबर से लेकर बहादुरशाह द्वितीय
जैसे सम्राटों तक चलती रही। इन टकसालों की संख्या 200 थी। ईस्ट इंडिया मॉरल एंड मैटीरियल प्रौग्रेस
रिपोर्ट (नीति और पदार्थ-प्रगति पर ईस्ट इंडिया की रिपोर्ट), 1872-73 में यह स्पष्ट है कि इनमें से
प्रत्येक टकसाल सोना, चांदी और तांबा जैसी तीन धातुओं के सिक्के तैयार करने में लगी हुई थी, परंतु
कुछ टकसालों में केवल सोने के सिक्के ढाले जाते थे और अन्य टकसालों में चांदी तथा तांबे के सिक्के
ढाले जाते थे। (देखिए, रिपोर्ट पृष्ठ 11-12)