7. स्वर्ण मानक की ओर वापसी - Page 310

स्वर्ण मानक की ओर वापसी

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‘‘कोर्ट एक परामर्श का उल्लेख किए बिना यहां रह सकती जिस पर लोगों ने बहुत जोर दिया है कि विनिमय को अनुकूल बनाने के लिए बैंक को केवल जारी की जाने वाली मुद्रा घटा देनी चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप बहुमूल्य धातु आने लगेगी। कोर्ट के विचार में यह घोषणा करना उसका कर्त्तव्य है कि इस भावुक विचार के पीछे उसे कोई मजबूत आधार नजर नहीं आता।’’

यदि डाइरेक्टरों की राय मूर्खता का एक नमूना था तो क्या फाउलर कमेटी की राय उससे किसी भी दशा में कम है? क्या उन दोनों के बीच में कोई अंतर है? इस प्रस्ताव में जो भावनाएं व्यक्त की गई हैं_ जो फाउलर कमेटी की सिफारिशों से भिन्न नहीं हैं उन पर टिप्पणी करते हुए बाजैट ने कहा कि कुछ ऐसी लंघूकारी परिस्थितियां हैं, जिनके कारण हम बैंक के डाइरेक्टरों को उनकी मूर्खता के लिए माफ करने पर मजबूर है। ये डाइरेक्टर उस समय के रहने वाले थे जब आर्थिक युक्तियुक्तता बहुत भ्रामक होती थी। न ही वे सोने को भारी मात्रा में आने के इच्छुक थे, क्योंकि कागजी मुद्रा से पूरी तरह संतुष्ट थे। परंतु इन दोनों स्थितियों में फाउलर कमेटी की मूर्खता को माफ नहीं किया जा सकता। उन्होंने अपनी सिफारिशें ऐसे समय की थीं जब बैंक डाइरेक्टरों के कथन के उल्टा ही यह उस समय का स्वयं सिद्ध नियम था। इसके अतिरिक्त यह नहीं कहा जा सकता कि वे भारतीय मुद्रा में सोने के भारी मात्रा में आगमन के इच्छुक नहीं थे। दूसरी ओर यही वह बात थी जो वे चाहते थे। फलतः उन्हें अपने शब्द सोच-विचार कर बोलने चाहिए थे और ऐसी किसी चीज की अनुमति नहीं देनी चाहिए थी जो उनके मुख्य उद्देश्य के अनुरूप न होती। ग्रेशम नियम के मूल सिद्धांत पर पर्याप्त ध्यान न देने के कारण कमेटी ने न केवल स्वयं को मूर्ख बनाया अपितु रिपोर्ट के पहले भाग में जो उद्देश्य उन्होंने अपने सामने रखा था, उसे भी हटा दिया।

दूसरे, क्या यह जरूरी था कि सरकार को रुपये के सिक्के ढालने की अनुमति दी जाती? वह समस्या भला किस प्रकार की थी जिसके बारे में कमेटी को फैसला करना था? आइए हम इसे दोबारा बता दें। हर्शल कमेटी ने भारत सरकार के प्रस्तावों का संशोधन करके 1892 में इसे देते हुए एक उपबंध की व्यवस्था की थी, जिसके अंतर्गत टकसालें जनता के लिए तो बंद कर दी गई थीं परंतु सरकार के लिए रुपये ढालने के लिए वह खुली रहनी थी। यह ऐसा उपबंध था जो यह प्रकट करता है कि इतने लम्बे-चौड़े सर्वेक्षण के बाद भी कमेटी इस रहस्य के प्रति कतई अनजान रही कि जिन मुद्रा प्रणालियों की उसने जांच की थी, उसमें मुद्रा ने बिना सोने के या थोड़े से सोने के होते हुए भी स्वर्ण से समानता क्यों बनाए रखी। यदि इसने यह समझ लिया होता कि जारी किए गए सिक्कों की सीमा के करण ही यह समानता बनी रही थी, तो शायद वह उपबंध न जोड़ती जो जोड़ा गया था। यह उपबंध चाहे