स्वर्ण मानक की ओर वापसी
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है कि इस राशि की आसानी से व्यवस्था की जा सकती है। उदाहरण के लिए लगभग 24 करोड़ रुपये के कागजी नोट प्रचलन में हैं जिसमें हमारे खजानों में पड़ी रकम भी शामिल है। यदि हम यह कल्पना कर सके कि वर्तमान में प्रचलन में जो मुद्रा कागजी नोटों की शक्ल में है, उसे अचानक 16,000,000 पौंड स्वर्ण में बदल दिया जाए, तब यह असंभव लगता है कि भारतीय व्यापार, वास्तविक प्रचलन की राशि कुछ भाग के बिना, चल सकेगा_ दूसरे शब्दों में यह संभव नहीं होगा कि सोने के सिक्कों की वह राशि देश से बाहर चली जाए जब तक कि रुपये का मूल्य विवश होकर इस बिन्दु तक न आ जाए जिससे निर्यात की धारा रुक जाएगी। यदि यही बात है तो वह बाहरी सीमा 24 करोड़ रुपये की है जिसे सोने के सिक्कों में बदला जाना चाहिए ताकि 16 पैंस की स्थायी विनिमय दर लागू की जा सके और उसके साथ उसी तुलनात्मक मूल्य पर सोना भी सक्रिय या गैर-सक्रिय ढंग से प्रचलन में हो_ और इस बात की संभावना अधिक है कि वास्तव में वांछित राशि की मात्रा उससे कम ही हो।
‘‘11. प्रचलन की मात्रा उस तरीके से कम की जा सकती है जिस तरह 1893 में की गई थी, अर्थात कौंसिल बिलों को वापस करना बंद कर दिया जाए, जब तक कि उदाहरण के लिए, हमारे पास अपने सामान्य संतुलन की अपेक्षा 20 करोड़ रुपये और जमा न हो जाएं। परंतु हमारा विश्वास है कि यह प्रक्रिया महंगी भी होगी और गैर-प्रभावकारी भी। एक तो 20 करोड़ रुपये स्थायी रूप से बंद करके रख देने का अर्थ यह होगा कि उसके ब्याज से हाथ धो बैठेंगे या जब निकालना बंद कर रखा होगा तब इंग्लैंड से उधार लिए जाने वाले सोने के ब्याज की हानि होगी। और दूसरी बात यह है कि यह 20 करोड़ रुपये के चांदी के सिक्कों को जमा करके रखने से विनिमय बाजार के सिर पर हमेशा एक खतरा मंडराता रहेगा और उससे रुपये के भविष्य पर से पूरी तरह विश्वास हट जाएगा। हमें न केवल प्रचलन से वह वापस ले लेनी चाहिए जो तरीका हम अपनाते हैं, उससे हमारी यह इच्छा स्पष्ट परिलक्षित होनी चाहिए कि वह राशि सिक्के के रूप में चलानी बंद हो जाए और उसकी जगह, सिक्के के रूप में सोना ले ले। इसलिए हमारा प्रस्ताव यह है कि वर्तमान सिक्कों को पिघला दिया जाए, परंतु उससे पहले (उधार लेकर) सोने का एक रिर्जव बना लें जो दो काम करे एक व्यावहारिक दृष्टि से चांदी का स्थान ले ले, और दूसरे हमारे कदमों पर विश्वास जमा दे।’’
जिस समय कमेटी ने यह रिपोर्ट दी उस समय प्रचलन में रुपयों का आधिक्य नहीं था जो इस बात से सिद्ध हो जाता है कि विनिमय की दर बढ़ रही थी और सोना आ