304 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
परंतु उस सबसे क्या देश को लाभ होगा? किसी भी हालत में नहीं। प्रो. कैनन ख्1, ने 1797 के कागजी पौंड की तुलना 1914 के कागजी पौंड से करते हुए जो नीतिगत नियम निकाला, उसे इस प्रकार कह दिया
‘‘इन दिनों निस्संदेह यह काम किसी को सौंपने का प्रयोग जो किसी समुदाय को
भी किसी संस्था को नहीं सौंपना चाहिए अर्थात बिना सीमा के मुद्रा बनाने का
काम बैंक ऑफ इंग्लैंड को सौंपा गया था उसकी तुलना अच्छी तरह आजकल
यह काम सरकार को सौंपने या पूरी तरह सरकारी नियंत्रण वाले स्टेट बैंक को
सौंपने से की जा सकती है। 1914-18 के अपेक्षाकृत संक्षिप्त युद्ध के दौरान
मुद्राएं जिन पर लिखा था ‘‘स्वेच्छा से सिक्के में परिवर्तनीय नहीं जिससे निष्कर्ष
किया जाता है सरकारी और सरकारी बैंकों द्वारा इतना अधिक मात्रा में मुद्रा जारी
की गई कि उसके मुकाबले 13 वर्षों में जारी की गई मुद्रा में 100 प्रतिशत की
वृद्धि बिल्कुल तुच्छ लगती है यद्यपि 1810 में सर्राफा कमेटी ने उसकी जोरदार
शिकायत की थी।’’
एक समय था जब यह कहा जा सकता था कि यह भर्त्सना भारत सरकार पर लागू की जा सकती। ऐसी सरकारें थोड़ी सी ही होंगी जो एक समय भारत सरकार की तरह मुद्रा के प्रबंध से अपना वास्ता न रखना चाहती हों। जब भारत सरकार ने 1861 में पहले-पहल कागजी मुद्रा जारी की थी, तब उसकी चिंता स्वागत योग्य थी। एक निर्धन सरकार, जो गदर के भारी बोझ के कारण धराशायी हो चुकी थी उसे तो कागजी मुद्रा की परियोजना का लाभ के स्रोत के रूप में स्वागत करना चाहिए था। परंतु उसमें इतनी अधिक उत्तरदायित्व की भावना थी कि सरकार ने इस बात से संतुष्ट होने से इन्कार कर दिया कि परिवर्तनीयता के कारण जरूरत से ज्यादा मुद्रा जारी करने पर रोक लग जाएगी। भारत की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए 1860 में तंगहाल वित्तकार मि. विल्सन ने कागजी मुद्रा की जो योजना तैयार की थी, उसे रद्द करने का एक प्रमुख कारण, उनके उत्तराधिकारी मि. लैंग ने बहुत अच्छे ढंग से बताया था और आजकल की उत्तेजनापूर्ण वित्तीय स्थिति में उसे दोहराना उपयुक्त प्रतीत होता है। उन्होंने कहा ख्2, µ
‘‘एक और भी महत्वपूर्ण कारण था कि उन्होंने (मि. लैंग) ने सोचा कि सर
चार्ल्स वुड का सिद्धांत सबसे ठोस था। सभी पक्ष इस बात पर सहमत थे कि
कागजी मुद्रा जो धातु की मुद्रा की जगह लेगी, ठीक उसी के जैसी होनी चाहिए।
परंतु जैसा कि मि. विल्सन का प्रस्ताव था कि यह दो-तिहाई सिक्यूरिटियों और
एक-तिहाई मूल्यवान धातुओं के बदले जारी की जानी चाहिए, तो उससे यह
पेपर पाउंड ऑफ 1741-1821 इंट्रोडक्शन पृष्ठ XXXIX
पेपर करेंसी बिल पर उनका भाषण 16 फरवरी, 1811, एस एल सी पी खंड- VII] पृष्ठ 66-67