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स्वर्ण मानक की ओर वापसी

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समरूपता रहना सुनिश्चित नहीं हो सकेगी और इस बात का भारी जोखिम बना

रहेगा कि तेजी और सट्टेबाजी के मौकों पर प्रचलन अनावश्यक रूप से बढ़

जाएगा। उनका विचार था कि यह मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि हम यह

देखें कि पिछले तीन वर्षों में भारत में क्या हुआ है तो हम देखेंगे कि मजदूर का

वेतन और वस्तुओं की कीमतें काफी बढ़ गई हैं। इसे हमें इस बात की चेतावनी

समझना चाहिए कि पहले से ही यह जो प्रक्रिया तेजी से चल रही है, यदि हम

कृत्रिम मुद्रास्फीति द्वारा इस प्रक्रिया को और तेज कर दें, तो उसके क्या परिणाम

निकलेंगे। यदि आपने कागजी मुद्रा के प्रचलन की मात्रा को बढ़ाकर अस्वाभाविक

रूप से कीमतों को बढ़ाया तो आप इस बात का पर्याप्त जोखिम उठाएंगे कि

वाणिज्य के स्वस्थ कार्यकलापों में बहुत उत्तेजनापूर्ण तेजी पैदा हो जाएगी और

फिर निश्चित रूप से उसकी प्रतिक्र्रिया होगी। यदि हम उसी तरह चलते रहे जिस

तरह पिछले दो या तीन वर्षों से चल रहे हैं, तो इसका परिणाम यह होगा कि

दूसरे देशों की प्रतिस्पर्धा के फलस्वरूप भारत की बनी कई वस्तुओं को मंडी से

निकल जाना पड़ेगा और इसलिए उनका विचार था कि सरकार को ऐसा कदम

उठाने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए जिससे आगे बढ़ने की प्रवृत्ति अनावश्यक

तेज गति से न बढ़ने लगे। और यह कागजी मुद्रा प्रणाली के फलस्वरूप हो

सकता है क्योंकि उसके पीछे अधिकांश तथा सिक्यूरिटियां होती हैं_ बहुमूल्य

धातु नहीं। यदि मजदूरी की दरों में और रहन-सहन के खर्च में सामान्य वृद्धि के

कारण वर्तमान वेतनमान और फौज के वेतन भत्ते पर्याप्त न रहे ख्1, तो ऐसी प्रगति

से हम ऐसे बिन्दु पर भी पहुंच सकते हैं जो सरकार के लिए भारी परेशानी पैदा

करने वाला हो सकता है। इस कारण से उन्होंने सोचा कि सर्वोत्तम तरीका यही

होगा कि हम उसी सिद्धांत पर डटे रहें जिसे इंग्लैंड ने कागजी मुद्रा के बारे में

अपनाया है और जैसा कि सर चार्ल्स वुड के प्रेषण में दिया गया है।’’

सरकार न केवल इस बात के लिए उत्सुक थी कि इसे परिवर्तनीय बनाने के साथ-साथ इसे जारी करने की भी सीमा होनी चाहिए_ परंतु वह नोट जारी करने का कानूनी अधिकार संभालना भी नहीं चाहती थी। भारत सरकार ने 27 अप्रैल, 1859 ख्2, को भारत सचिव को भेजे गए अपने एक प्रेषण में कहा किµ

‘‘हमारा विश्वास है कि मांग पर नोटों की परिवर्तनीयता जरूरत से ज्यादा नोट

जारी करने के विरूद्ध पर्याप्त गारंटी नहीं होगी। जब एक बार कागजी मुद्रा पर

लोगों का विश्वास जम जाएगा तब यदि पूरी शक्ति केवल भारत सरकार के हाथों

में दे दी गई, तो कठिनाई के समय सरकार को बहुत प्रलोभन हो जाएगा कि

  1. यहां पर यह बात नोट की जानी चाहिए कि इंग्लैंड में बैंक सस्पेंशन अवधि के दौरान सेना और नौसेना

में स्वर्ण में वेतन बांटा जाता था ताकि कहीं उनमें असंतोष न पैदा हो जाए

  1. इसकी एक प्रति के लिए देखिए कॉमन्स पेपर 183, (1860 का) पृष्ठ