1. दोहरे मानक से रजत मानक तक - Page 33

18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की अनदेखी करते हुए अपने साम्राज्य ख्2, के सबसे सुदूर भागों में भी स्थित विभिन्न टकसालों से जारी किए गए सिक्कों के मानक से मूल रूप से भिन्न नहीं होने दिया। आगे दी गई तालिका में मुगल-रुपयों की कसौटियां दिखाई गई हैं कि मुगल साम्राज्य के काल में सिक्के का मानक 175 ग्रेन शुद्ध भार के स्तर तक रखा गया। ख्1,

रुपये का नाम ­ शुद्ध ग्रेन में भार­ रुपये का नाम ­ शुद्ध ग्रेन में भार ­ लाहौर का अकबरी ­ 175.0­ दिल्ली सोनत ­ 175.0­ आगरे का अकबरी ­ 174.0­ दिल्ली आलमगीर­ 175.0­ आगरे का जहांगीरी ­ 174.6­ पुराना सूरत ­ 174.0­ इलाहाबाद का जहांगीरी ­ 173.6­ मुर्शिदाबाद ­ 175.9­ कंधार का जहांगीरी ­ 173.9­ 1745 का फारसी रुपया ­ 174.5­ आगरे का शाहजहांनी ­ 175.0­ पुराना ढाका ­ 173.3­ अहमदाबाद का शाहजहांनी ­ 174.2­ मुहम्मदशाही ­ 170.0­ दिल्ली का शाहजहांनी ­ 174.2­ अहमदशाही ­ 172.8­ दिल्ली का शाहजहांनी­ 175.0­ शाहआलम ­ 175.8­ लाहौर का शाहजहांनी ­ 174.0­

­जब तक साम्राज्य ने अक्षुण्ण प्रभाव बनाए रखा तब तक टकसालों की बहुलता में

खतरा न होकर लाभ ही था क्योंकि एक ही सत्ता के एक विभाग की अनेक शाखाएं थीं। परंतु मुगल साम्राज्य के विघटन के बाद उसके अलग-अलग टुकड़ों में विभाजन के फलस्वरूप शाही टकसाल की विभिन्न शाखाएं सिक्का ढालने के प्रयोजन से स्वतंत्र कारखानों में परिवर्तित हो गई। मुगल साम्राज्य के पतन के बाद स्वतंत्रता के सामान्य होड़ के कारण संप्रभुता के सबसे अचूक लक्ष्य के रूप में सिक्का ढालने का अधिकार तत्कालीन राजनीतिक खिलाडि़यों के लिए सर्वोपरि बन गया था यह भी अनंतिम सुविधा थी, जिससे पतनोन्मुख राजवंश चिपटे रहे और यही उन साहसी सत्ता हथियाने वालों का प्रथम लक्ष्य बन गया। इसका परिणाम यह हुआ कि वह अधिकार जो कभी पूर्ण निष्ठा से कार्यान्वित किया जा रहा था उसका अनुशासनहीता से दुरुपयोग किया गया। प्रत्येक स्थान पर टकसालें पूरे जोर शोर के साथ चलाई गइंर् और शीघ्र ही देश में विभिन्न प्रकार के सिक्के नजर आने लगे। राजवंशों का शीघ्र ही लगातार उत्थान तथा पतन होने लगा और इससे विनिमय का आश्चर्यचकित माध्यम भी प्रस्तुत हुआ। यदि इन मुद्रा के व्यापारी राजाओं ने मुगल सम्राटों के मूल मानक के

  1. प्रिंसेज जे. सामने का उद्धरण, पृष्ठ 18