7. स्वर्ण मानक की ओर वापसी - Page 321

306 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इस विश्वास का खतरनाक रूप से लाभ उठाया जाए। हमारे विचार से कानूनन

प्रतिबंध लगाना आवश्यक होगा चाहे वह जारी की जाने वाली पूर्ण राशि पर

हो अथवा भारत में पड़े रोकड़ शेष से सम्बद्ध हो। हमारे विचार में यह कानून

(ब्रिटिश) पार्ले भेंट द्वारा पास किया जाना चाहिए न कि लेजिस्लेटिव कौंसिल

ऑफ इंडिया द्वारा।’’

1876 में रुपया मुद्रा के बारे में सरकार का दृष्टिकोण भी उतना ही संतुलित था। यहां पर यह याद किया जा सकता है कि बंगाल चैम्बर ऑफ कॉमर्स ने भारत सरकार से अनुरोध किया था कि चांदी के सिक्के मुक्त रूप से बनाने के लिए टकसालों को बंद कर दिया जाए और उन्हें सोने के सिक्के मुक्त रूप से बनाने के लिए भी नहीं

खोला जाना चाहिए। व्यावहारिक दृष्टि से इसका मतलब था कि सरकार रुपया मुद्रा की व्यवस्था का भार संभाल ले। सरकार ने इसका उत्तर कड़ी दुत्कार के रूप में दिया। उसकी घोषणा थी ख्1, µ

‘‘8......... चैम्बर ने सरकार को ऐसा कदम उठाने के लिए निमंत्रित किया है

जिससे रुपये का मूल्य अनिश्चित ढंग से बढ़ जाए और इसके लिए दीर्घकालीन

सुस्थापित सभी व्यक्तियों के वे अधिकार स्थगित कर दिये जाएं जिसके अंतर्गत

सरकारी देखरेख में एक सी शर्तों पर वे चांदी की धातु देकर वैध मुद्रा ढलवा

सकते थे और उसकी जगह वे अस्थायी रूप से सरकार को अपने विवेक से

सिक्के ढालने की प्रणाली को देना चाहते थे.................।

* * * * *
  1. मुद्रा की एक ठोस प्रणाली के लिए यह जरूरी है कि वह स्वतः चालित

हो। कोई व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों का एक समूह यह पता नहीं लगा सकता

कि किसी विशेष समय पर समूचे समुदाय के हित के लिए मुद्रा में कमी करनी

चाहिए या वृद्धि, और इसका पता तो और भी कम चलता है कि ठीक कितनी

मुद्रा बढ़ाने या घटाने की आवश्यकता पड़ेगी। कोई भी सरकार जो अपनी मुद्रा

को मजबूत स्थिति में रखना चाहती है, वह ऐसा असंभव कार्य करने की कोशिश

करेगी, अथवा समुदाय को थोड़े समय के लिए भी मूल्य के निश्चित धातु स्टैंडर्ड

के बिना रखना चाहेगी तो उसे उचित नहीं कहा जाएगा। ‘‘सिक्का बनाने की

मुक्त प्रणाली’’ के अंतर्गत बिना सरकारी हस्तक्षेप के ये चीजें अपना नियमन

खुद कर लेती हैं।’’

  1. चांदी के मूल्य ह्रास से संबंधित भारत सरकार प्रस्ताव, दिनांक 22 सितम्बर, 1870, कॉमन्स पेपर

449-1892 का।