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स्वर्ण मानक की ओर वापसी

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अब इसकी तुलना सरकार की बाद की घोषणाओं से कीजिए जो क्र्रमशः कागजी मुद्रा और रुपया मुद्रा की व्यवस्था करने वाले सिद्धांतों के बारे में की गई। युद्ध के दौरान जब सरकार कागजी मुद्रा बढ़ा कर जारी करने लगी, तो सुप्रीम लैजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्यों ने बताया कि भारत में कीमतों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। परन्तु स्वर्गीय सर विलियम मेयेर ने, जिनके हाथ में युद्ध के दौरान भारतीय वित्त की पतवार थी, इंडियन पेपर करेंसी (अमेंडमेंट) बिल दिनांक 5 सितम्बर, 1917 पर भाषण देते हुए निम्नलिखित उत्तर दिया ख्1, µ

‘‘युद्ध से पहले प्रचलन में नोटों की संख्या 60 करोड़ थी जो अब लगभग एक

सौ करोड़ है। परंतु माननीय मि. सरमा मुद्रास्फीति के विचार से कांपने लगे। परंतु

मैं उन्हें याद दिलाना चाहूंगा कि अर्थशास्त्रियों में एक स्वीकृत (!) मत यह होता

है कि कागजी मुद्रा की कृत्रिम मुद्रास्फीति तभी होती है जब नोटों का प्रचलन पूरी

तरह पृष्ठांकित न हो। अब हमने अपने प्रचलन के नोटों का एक-एक रुपया......

सिक्यूरिटियों से पृष्ठांकित कर रखा है। ‘‘ [ फिर मुद्रास्फीति कैसे हो सकती है? ]

रुपया मुद्रा के बारे में भी सरकार दृष्टिकोण में आया परिवर्तन उतना ही ध्यान देने योग्य है। 1908 में जब रुपये का विनिमय मूल्य उसके रूप मूल्य से गिर गया, तब सरकार को याद दिलाया गया कि ऐसा रुपये के जरूरत से ज्यादा सिक्के ढालने के कारण हुआ है। परंतु यद्यपि 1876 में सरकार इसे संभव नहीं मानती थी कि वाणिज्य व्यापार की आवश्यकताओं को देखते हुए मुद्रा को इस तरह बढ़ाया या घटाया जा सकता है फिर 1908 में सरकार ने इसका बिल्कुल उल्टा विचार प्रस्तुत कर दिया। वित्तमंत्री माननीय मि. बेकर ने अपने उत्तर में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किया ख्2, µ

‘‘सबसे पहली बात तो यह है कि इस अवधि में हमने जितने भी नए सिक्के बनाए हैं_ वे केवल व्यापार की मांग को पूरा करने के लिए बनाए गए हैं। प्रचलन में एक भी रुपया ऐसा नहीं डाला गया जो हमें केवल इन मांगों को पूरा करने योग्य न बनाता हो.........’’

अब यदि यह बात खतरनाक है कि किसी सरकार को मुद्रा की व्यवस्था करने की शक्ति सौंपी जाए तो भारत सरकार को यह सौंपना कितना खतरनाक है जो अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए इस प्रकार के सिद्धांतों का सहारा लेना चाहता है। इन दिनों कोई भी इतना अनभिज्ञ नहीं है जो यह मानता हो कि ऐसी सूक्तियां ठोस हैं। यदि सुरक्षा पर्याप्त है तो परिवर्तनीयता की आवश्यकता ही क्या है? यदि मुद्रा

  1. एस.एल.सी.पी. खंड- LVI, पृष्ठ 229

  2. तुलना करेंµफाइनेंशियल स्टेटमैन फार 1908-9, पृष्ठ 229