दोहरे मानक से रजत मानक तक
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समान अपनी मुद्राओं को बनाए रखा होता तो समान मूल्य के भिन्न-भिन्न प्रकार के सिक्कों को बनाने से कोई चिंता की बात नहीं थी। परंतु उन्होंने यह धारणा बना ली थी कि उनकी प्रजा द्वारा जिस मुद्रा का उपयोग होता था वह मुद्रा उनके द्वारा बनाई गई है। अतः इस क्षेत्र में वे जैसा चाहें कर सकते हैं तथा उन्होंने अनेक सिक्कों को घटिया धातु का बनाना शुरू कर दिया यद्यपि उसका मूल्य वही रखा जो इन सिक्कों में धातु की अलग-अलग मिश्रण के कारण मुद्रा ने अपना प्रमुख गुण सार्वजनिक मान्यता व तुरंत लेन-देन क्षमता को आवश्यक रूप से खो दिया।
इस स्थिति के फलस्वरूप उत्पन्न बुराइयों की केवल कल्पना की जा सकती है। जब सिक्कों के तत्वों में उन पर अंकित मूल्य को झुठला दिया गया तो वे केवल व्यापार की वस्तुएं ही रह गए और कहने के लिए कोई भी मुद्रा ऐसी नहीं रही जिसे विनिमय के लिए तुरंत साधन माना जाए। प्रत्येक सिक्के के सर्राफा मूल्य को सुनिश्चित किया जाता था ताकि इसे दायित्वोंऽ के अंतिम वहन के लिए स्वीकार किया जाए। इस प्रकार गरीबों और अनजान लोगों को धोखा देने का अवसर इंग्लैंड में 1696 के सिक्कों के पुनर्गठन के पूर्व की अपेक्षा कहीं कम [†] नहीं रहा होगा। इस प्रकार लगातार सिक्कों में मिश्रित धातुओं की स्थिति की मिलावट की पहचान के लिए सिक्कों को तौलने, उनका मूल्यांकन करने और उन्हें कसौटी पर घिसकर उनका पता लगाना इस बुराई का एक पक्ष उजागर हुआ। उन्होंने दूसरा भयंकर पक्ष भी प्रस्तुत किया। साम्राज्य के पतन के साथ ही संपूर्ण भारत में शाही वैध मुद्रा जैसी वस्तु लोप हो गई। इसके स्थान पर साम्राज्य के छिन्न-भिन्न हो जाने की स्थिति में अलग-अलग राज्य क्षेत्रों में स्थानीय मुद्रा बनने लगी। ऐसी परिस्थितियों में वस्तु विनिमय, वस्तु के बदले आवश्यक भुगतान में दिए गए सिक्कों की सर्राफा मूल्य से परिसमाप्त नहीं किया गया। व्यापारियों को इस बात से आश्वस्त होना पड़ता था कि सिक्के उनके निवास क्षेत्र में भुगतान के वैध माध्यम हैं। इस विषय पर बंगाल करैंसी रेग्यूलेशन 35, 1793 की प्रस्तावना
ऽ छोटे सिक्कों के सर्राफा के वास्तविक मूल्य का पता लगाने की आवश्यकता थी जिसने मुद्रा बदलने वाले
वर्ग को जन्म दिया जो सर्राफ कहलाया, जिन्हें सिक्कों पर खुदी हुई तारीखों और उनकी विचित्रताओं
के आधार पर सिक्कों की मानक शुद्धता की दृष्टि से उचित मूल्यांकन में विशेषज्ञता प्राप्त थी। † यह बताया गया है कि डॉ. रॉक्सबर्ग इस बात के साझी थे। मुद्रा की खराब हालत के कारण गरीबों
की दुर्दशा से इतने अधिक प्रभावित थे कि उन्होंने तारीख 30 जून, 1791 को ए.डैलरीम्पल को लिखे
पत्र में इस बुराई का विशेष रूप से जिक्र किया और इस हेतु अपने ओरियंटल रिपरटरी (2 खंड,
लंदन,1808) में एक लेख लिखा जिसका विषय था कि कंपनी के उन राज्य क्षेत्रों में परिचालित चालू
सिक्का शासक और शासित दोनों के लिए ही सबसे ठोस और अधिक समय तक लाभ देने वाले हों
और यह भी लिखा कि ‘‘आप इस अवगुण को सही कर सकते हैं और ऐसा करने पर आपको स्वर्ग
मिलेगा यदि दीन-दुखियों ने आपके लिए प्रार्थना की हो और मैं भी स्वर्ग के समीप एक कदम आगे
बढ़ जाऊंगा। ए. डैलरीम्पल कृत, ‘‘औब्जरवेशन्स ऑन दि कॉपर कौइनेज वांटिड इन दि सरकारस’’,
लंदन, 1794 पृष्ठ 1 पर अंकित।